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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामाधार सिंह का निधन, संघर्ष करते-करते ही बीत गया जीवन

पट्टे की जमीन पर मकान बनाया तो हो गया था कब्जा, गांव में भी नहीं बना पाए खुद का घर

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Ramadhar Singh's freedom fighter died passed away after struggling

Ramadhar Singh's freedom fighter died passed away after struggling

छतरपुर। लवकुशनगर क्षेत्र की ग्राम पंचायत देवरी के ग्राम परमाढोर निवासी ११० वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामाधार सिंह का शुक्रवार की सुबह 9.40 बजे निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे निधन की खबर लगते ही प्रशासन ने अंतिम संस्कार की तैयारियां की और शाम ४ बजे के बाद उनका अंतिम संस्कार किया गया।उनके भतीजे हीरा सिंह ने उन्हें मुखाग्रि दी। शासन की ओर से उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। इस मौके पर एसडीएम रवींद्र चौकसे, नायब तहसीलदार बछौन रामबाबू दीक्षित, चंदला थाना प्रभारी और बछौन चौकी प्रभारी सहित पुलिस जवान मौजूद थे।
कलेक्टर-एसपी और सीईओ पहुंचे, दी श्रद्धांजलि, घोषणाएं भी की :
शुक्रवार को कलेक्टर रमेश भंडारी, जिला पंचायत सीईओ हर्ष दीक्षित और एसपी विनीत खन्ना लवकुशनगर क्षेत्र में ही मौजूद थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामाधार सिंह के निधन की जानकारी लगने पर शाम को वे उनके गांव देवरी पहुंचे। यहां पर स्वतंत्रा संग्राम सेनानी को अधिकारियों ने श्रद्धांजलि दी। इस मौके पर कलेक्टर ने उनके नाम से गांव में द्वार बनवाने, पार्क का निर्माण कराने और मिडिल स्कूल का नामकरण रामधार सिंह के नाम से करने की घोषणा की।
संघर्ष में ही बीत गया जीवन, घर भी छिन गया था :
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामाधार सिंह का पूरा जीवन संघर्ष करते ही गुजर गया। पहले उन्होंने आजादी के लिए संघर्ष किया। बाद में अपने हक के लिए संघर्ष करते रहे। लेकिन जीवन भर उन्हें उनका हक नहीं मिल सका। शासन-प्रशासन केवल १५ अगस्त और २६ जनवरी के समारोह में उन्हें सम्मानित करने बुलाता रहा और फिर उनको उनके हाल पर छोड़ता रहा। लवकुशनगर के समाजसेवी राजेश निगम बताते हैं कि नगर पंचायत लवकुशनगर द्वारा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामधार सिंह जी को मकान बनाने पट्टा दिया था। उस जमीन पर उन्हेांने अपनी जमा पूंजी से मकान बनाया। उन्हें तीर्थ यात्रा पर जाना था तो उन्होंने उस मकान को किराए पर दिया और तीर्थ करने चले गए। लेकिन जब वे लौटकर आए तो किराएदार ने ही मकान पर कब्जा कर लिया। इसके लिए उन्होंने मुख्यमंत्री से लेकर कलेक्टर-एसपी और सभी अधिकारियेां व पुलिस के पास सालों चक्कर लगाए। लेकिन उनका मकान किसी ने भी खाली नहीं करवाया। पूरे जीवन भर वे मकान के लिए संघर्ष करते रहे। बाद में उन्हें उनके गांव में देवरी पंचायत ने पट्टा दिया, लेकिन दबंगों ने वहां भी उन्हें मकान नहीं बनाने दिया। बिना घर के ही उनका पूजा जीवन गुजर गया। जीवन का अंतिम पड़ाव वे अपने भतीजों के घर पर रहकर काटते रहे और वहीं अंतिम सांस ली।