
Chhatarpur
नीरज सोनी
छतरपुर। शहर की एक संस्था है निर्वाना फाउंडेशन जहां गरीब, दिव्यांग, असहाय, वृद्ध और विक्षिप्त महिला-पुरुष तथा बच्चों के परिवार के रूप में आसरा मिलता है। बिना किसी सरकारी मदद, अनुदान और वित्तीय योजना के चल रही इस संस्था के प्रमुख संजय सिंह आज के दौर में नौजवानों के लिए बड़ी मिशाल है। जब वे बेरोजगार थे उस दौरान दो साल तक उन्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ा। दो सालों के लंबे संघर्ष, तकलीफों और मुफलिसी की जिंदगी से प्रेरणा लेकर संजय ने पहले खुद को स्थापित किया। देश-विदेश में नौकरी की और जब लाइफ सेटल हो गई तो मल्टीनेशनल कंपनी की 40 लाख रुपए पैकेज की नौकरी छोड़कर ऐसे लोगों के लिए जीवन समर्पित कर दिया जिनका इन दुनिया में कोई सहारा बनना नहीं चाहता। आने वाले समय में वे करीब तीन सौ जरूरतमंद लोगों के लिए ऐसा घर बनाना चाहते हैं, जिसमें वृद्ध, बच्चों, महिला, दिव्यांग एक साथ परिवार की तरह रहें।
महाराष्ट्र के पूना शहर में जन्मे 47 वर्षीय संजय सिंह ने 2014 में निर्वाना फाउंडेशन नाम से गैर सरकारी संस्था की स्थापना की थी। निर्वाना शब्द का अर्थ मोक्ष से जोड़ते हुए लोगों के जीवन को खुशहाली की ओर ले जाने का ध्येय लेकर संजय सिंह अपनी संस्था के माध्यम से ऐसे लोगों की मदद करते आ रहे हैं, जिन्हें सड़कों पर लोग लावारिश हालत में छोड़ जाते हैं। अब तक वे कई ब"ाों और वृद्धों व महिलाओं ने उनके बिछुड़े परिजनों से मिला चुके हैं तो दो दर्जन से अधिक लोगों को अपने आश्रय गृह और चाइल्ड होम में रखकर उनकी सेवा कर रहे हैं। इस काम के लिए वे किसी भी तरह की सरकारी मदद नहीं लेते। केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की संस्था की टीम उनके काम को देखकर मदद की पेशकश कर चुकी हैं। वहीं सागर कमिश्नर से लेकर शासन के अफसर भी उनके यहां बिजिट करके आर्थिक मदद की पेशकश कर चुके हैं, लेकिन उन्होंने यह कहकर सरकारी मददद लेने से इनकार कर दिया कि वे सेवाओं को सीमाओं से नहीं बांधना चाहते हैं। अगर हमारा काम अ'छा है तो शासन हमारे साथ मिलकर काम करें।
बुरे दिनों से सबक लेकर बदल लिया जीवन का लक्ष्य :
संजय सिंह के जीवन का संघर्ष जानकर लोग सिहर उठते हैं। उनके पिता बायुसेना में थे। 1998 से 2000 के बीच का समय उनके जीवन का सबसे कठिन दौर था। संजय बताते हैं कि उस समय रोजागर नहीं था। दो से तीन दिन तक भोजन भी नसीब नहीं होता था। नौकरी की तलाश में वे हर दिन मीलों पैदल घूमते थे। उस दौरान फुटपाथ पर रहने वाले लोगों को करीब से देखा। पेट की भूख ने उनकी तकलीफ का अहसास भी कराया। साल 2000 में उन्हें क्यूनोक्स सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी मिल गई तो वे 14 हजार रुपए मासिक सैलरी पर मुंबई में काम करने पहुंच गए। पूना से ही एमबीए की डिग्री हासिल करने के बाद वे अ'छे पैकेज पर नौकरी करने लगे। अपने बुरे दिनों से सबक लेकर संजय ने इस दौरान मुंबई में ही 15 परिवारों को गोद लिया और 2001 से 2003 तक निर्धन-असहाय परिवारों के ब'चों की पढ़ाई से लेकर उनके इलाज, भोजन तक की व्यवस्था की जिम्मेदारी खुद उठाई। 2014 में उन्होंने 40 लाख सालाना पैकेज की सरकारी नौकरी छोड़ी और पूरी तरह से गरीबों क सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। 1 सितंबर 15 को छतरपुर में अपने ससुर रिटायर स्वास्थ्य निरीक्षक लोकपाल सिंह के ढड़ारी गांव स्थित खेत पर वृद्धाश्रम शुरू करके अपने सेवा कार्य को शुरू कर दिया। एक साल बाद ही पन्ना रोड पर उन्होंने एक भवन किराए से लेकर निर्वाणा फाउंडेशन की बुनियाद रखी। जहां दो दर्जन से अधिक असहाय, मानसिक विक्षिप्त व दिव्यांग जनों की सेवा करके उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में लगे हैं।
अपनों का घर बनाने की है योजना :
संजय सिंह ने दो साल तक अपनी कंपनी में पार्ट टाइम जॉब छतरपुर में रहकर किया। इसके बाद वे पूरे तरीके से समाजसेवा में लग गए। उनका सपना एक ऐसा घर बनाने की है जहां धर्म, जाति, संप्रदाय, वर्ग, ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं रहे। इसी सिस्टम पर वे अभी काम भी कर रहे हैं। उन्होंने 8 एकड़ जमीन बसारी के पास खरीदी है, जहां वे &00 लोगों के लिए ऐसा घर बनाएंगे जहां से असहाय ब"ो, महिलाएं, दिव्यांग आत्मनिर्भर और अ'छे इंसान बनकर समाज में निकलेंगे। वृद्धों को स्थाई घर यहीं पर देंगे, जहां से उन्हें जीवनभर रहने के साथ ही अंतिम समय में निर्वान तक की व्यवस्था होगी।
Published on:
03 Feb 2019 08:00 am

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