30 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

नौगांव छावनी के सैनिकों ने भी की थी आजादी के लिए 1857 में बगावत

23 अप्रेल को नए कारतूस को लेकर सुलगी विद्रोह की चिंगारी, 10 जून को बागियों ने फूंका शस्त्रागरमई और जून में तनी रही तोपें, 19 जून को बागी सैनिकों ने अंग्रेज अफसर सेकंड लेफ्टिनेंट की कर दी हत्या

2 min read
Google source verification
Rebel soldiers killed British officer second lieutenant on 19 June

Rebel soldiers killed British officer second lieutenant on 19 June

छतरपुर। देश की आजादी के लिए 1857 में हुए पहले स्वतंत्रता संग्राम में नौगांव छावनी के जवान भी शामिल हुए थे। 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम की असली सुगबुगाहट बुंदेलखंड की नौगांव छावनी से हुई थी। मेरठ में विद्रोह होने से पहले ही छतरपुर जिले के नौगांव छावनी के सिपाहियों में विद्रोह की आग भड़क उठी थी। आजादी के मतवालों ने छावनी के शागार को फंूक दिया। अंग्रेज की तोपों पर कब्जा कर लिया। नौबत ये आ गई कि अंग्रेज अफसर को भागना पड़ा। बागियों ने अंग्रेज अफसर का पीछा किया और उसकी हत्या कर दी।

अंग्रेजों को सुरक्षा के लिए लगानी पड़ी तोपें
नौगांव के इतिहास के जानकार दिनेश सेन ने बताया कि 1857 की क्रांति के समय नौगांव छावनी में 12वीं भारतीय पलटन के 400 बंदूकधारी, 219 घुड़सवार,40 तोपची व पैदल सिपाही थे। इस फौज का कमांडर मेजर किटके तथा स्टाफऑफीसर केप्टन पीजी स्पाट थे। 23 अप्रेल को ही छावनी में कुछ गोलियां दागी गई थी। इनके कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी होने के कारण सेना में असंतोष फैल गया। असंतोष धीरे-धीरे बढऩे लगा तो अंग्रेज अफसरों ने छावनी की सुरक्षा के लिए 24 मई को चार तोपें तैनात कर दी थी। चौकसी के लिए सिपाहियों को अधिक फासले पर लगा दिया, ताकि वे आपस में न मिल सके। इसी बीच 30 मई को वेतन हवलदार सरदार खां ने चार सिपाहियों पर बागावत करने का संदेह जताया। इन्हें बर्खास्त कर छतरपुर भेजा गया। मेजर किरके द्वारा सभी 12 तोपें पलटन के क्वार्टर के सामने लगा दी गई।

10 जून को सैनिकों ने किया हमला
बुंदेलखंड का स्वतंत्रता संग्राम पुस्तक व नौगांव के बलभद्र पुस्तकालय की पुस्तकों के मुताबिक झांसी में क्रांति होने पर नौगांव से दो सैनिक पार्टियां झांसी भेजी गई, उन्हें क्रांति की जानकारी दिए बगैर भेजा गया, लेकिन सैनिकों को क्रांति की खबर लग गई। सैनिक पार्टी ने भी आजादी का बिगुल फूूंकने और बीच में ही वापस लौटकर अंग्रेजों का कत्ल करने का निश्चय कर लिया। झांसी के रास्ते से वापस लौटे बागी सैनिकों ने 10 जून की शाम छावनी पर गोलियां दागी। खबर लगते ही टाउनशैड, ईवार्ट तथा स्पाट घोड़ों से भागे, लेकिन तब तक सिपाहियों ने तोपों पर कब्जा कर लिया था। विद्रोहियों ने तोपें दागकर अंग्रेजों के भागने के सभी रास्ते बंद कर दिए। स्पाट ने शस्त्रागार पहुंचकर निगरानी कर रहे सिपाहियों को बागियों पर धावा बोलने कहा। लेकिन उन्होंने न सुनी।

19 जून को अंग्रेज अफसर की कर दी हत्या
बागियों ने शस्त्रागार उड़ाने के बाद छावनी के बंगलों पुस्तकालय और रिकॉर्ड में अगा लगा दी। खजाने से 1.21 लख रुपए की संपति लूट ली गई। सेकेंड लेफिटनेंट टाउनशेड व सार्जेट रैटे, कुंघ्य नायक बिगुलची रोडरिक 80 सिपाहियों एवं तीन भारतीय अधिकारियों सहित यहां से बच निकले। 10 जून की रात यह लोग छतरपुर की महारानी से शरण मांगने आए। उन्हें एक सराय में ठिकाना मिल गया। लेकिन रानी ने उनसे हमदर्दी नहीं दिखाई। दो दिन बाद वे यहां से भाग गए। विद्रोहियों ने 19 जून को टाउनशेड की महोबा से कलिंजर के रास्ते जाते समय हत्या कर दी।

Story Loader

बड़ी खबरें

View All

छतरपुर

मध्य प्रदेश न्यूज़

ट्रेंडिंग