- गांधी जी की पुण्यतिथि पर छतरपुर आए आनस्क्रीन गांधी
छतरपुर। महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर अंतर राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अभिनेता एंव आर्टिस्ट सुरेंद्र राजन मंगलवार को छतरपुर में थे। उन्होंने गांधी आश्रम में आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम व प्रार्थना सभा में हिस्सा लिया और शहर में निकाले गए शांतिमार्च में भी शामिल हुए। इस दौरान पत्रिका से खास बात-चीत में उन्होंने अपने जीवन के बहुत से अनछुए पहलुओं को साझा किया। उन्होंने बताया कि वे कैसे एक चित्रकार-मूर्तिकार और फोटो आर्टिस्ट से अभिनेता बन गए। एक दर्जन हिंदी, अंग्रेजी फिल्मों में महात्मा गांधी का किरदार निभाने वाले सुरेंद्र राजन अब खुद महात्मा गांधी की तरह जीने लगे हैं। बुंदेलखंड के पन्ना जिला के अजयगढ़ कस्बा निवासी राजन मंगलवार को छतरपुर में जब अपने पुराने परचितों से मिले तो उनसे ठेठ बुंदेलखंडी में बातचीत करने नजर आए।
केवल चेहरा देखकर दे दिया फिल्मों का ऑफर :
राजन बताते हैं कि कई बार मैग्जीन और अखबारों में उनकी फोटो व इंटरब्यू प्रकाशित हुए। एक बार बिना दाड़ी वाला फोटो छता तो कुछ लोगों को मुझमें महात्मा गांधी के चेहरे की झलक दिखी। पहली बार फिल्म परिणति में उन्हें आर्ट डायरेक्टर के रूप में काम मिला, लेकिन इसमें भोपा का एक छोटा सा रोड करना पड़ा। अरुंधति राय ने फिल्म फेस्टिवल में देखा तो एक इंग्लिश फिल्म में काम दिया। जब यह सब मीडिया में आया तो मुझे फिल्मों के ऑफर मिलना शुरू हो गए। सबसे पहले लीजेंड ऑफ भगत सिंह फिल्म में बापू की भूमिका मिली, इसके बाद एक-एक कर 12 फिल्मों में महात्मा गांधी के रोल मिले। उन्होंने बताया कि हालही में वे एक मलयालम फिल्म में भी गांधी की भूमिका निभाकर लौटे हैं।
पूरा जीवन ही फक्कड़ता में गुजारते चले आ रहे हैं : सुरेंद्र राजन ने बताया कि वे बुंदेलखंड के पन्ना जिले के अजयगढ़ के रहने वाले हैं। 12 साल की उम्र में वे अपने ताऊ के साथ ही रीवा चले गए। एग्रीकल्चर कॉलेज में एडमिशन लिया। अचानक पेंटिंग को लेकर रुचि पैदा हो गई तो लखनऊ जाकर आट्र्स कॉलेज में एडमिशन ले लिया। फिर मूर्तिकला में रुचि पैदा हो गई। 1965 में एक चित्र को एग्ज्यूकेटिव अवार्ड मिला। इसके बाद कला के क्षेत्र में पहचान मिलती चली गई। टीचर की सलाह पर दिल्ली गया। 15 साल तक वहां रहकर नाम-शोरहत, रुपया सब कमाया। लेकिन फिर सोचा कि जीवन में कुछ भी अमर नहीं है। इसलिए अचानक ही सब छोड़कर देश-दुनिया की सैर पर घूमने निकल गया। 16 साल तक बिना घर के घूमता रहा। इस दौरान फोटोग्राफी और पेंटिंग व रेडियो कार्यक्रम से मिलने वाले मानदेय से गुजारा भी करता रहा। दोस्तों ने मिलकर फियट कार खरीदकर दे दी। तो उससे घूमा। बाद में कुछ समय विदेशों में जाकर अपनी कला के साथ जीता रहा। विदेश से लौटकर पांडिचेरी में फ्रेंच इंस्टीट्यूट में काम शुरू कर दिया। फिर दिल्ली आकर वर्ड लाइफ के लिए फोटोग्राफी का असाइनमेंट मिला तो बांधवगढ़ में इस पर काम किया। उन्होंने बाताया कि घूमने-फिरने के अपने शौक के कारण उन्होंने शादी करना मुनासिब नहीं समझा।
बापू की भूमिका करते ही खुद को भूल जाता था :
अभिनेता राजन ने बताया कि जब उन्हें फिल्मों में महात्मा गांधी की भूमिका करने के लिए ऑफर मिला और उन्होंने इस चरित्र में खुद को ढालने के लिए कुछ डाक्यूमेंट्री देखी। इसके बाद जब में शूटिंग के दौरान बापू की भूमिका निभाता था तो खुद को भूल जाता था। ऐसा अहसास होता था कि जैसे मैं खुद ही महात्मा गांधी हूं। उन्होंने बताया कि वे पहले से ही बापू को पढ़ते रहे हैं। उनसे प्रभावित था। आजादी के पहले जन्म हुआ था इसलिए देश आजाद होने पर उस खुशी का अहसास भी था। इसलिए जब बापू की भूमिका निभाने की बात आई तो बहुत मदद मिली।
कुछ अचीव करने की चाहत नहीं, इसलिए हिमालय में बना लिया ठिकाना : अभिनेता सुरेंद्र राजन ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में कभी भी कॅरियर के क्षेत्र के कुछ भी अचीव करने और सफलता-असफलता से दूर-दूर तक वास्ता नहीं रखा। बल्कि अपनी जिंदगी को फक्कड़ रखते हुए जीवन को प्रकृति के बीच गुजारा। उन्होंने बताया कि पहले से ही तय कर लिया था कि ७५ साल की उम्र पूरी होते ही वे हिमालय में ही रहेंगे। इसलिए उन्होंने गढ़वाल के पास एक गांव में किराए से छोटा सा घर ले लिया और अब वहीं पर रहते हैं। जब कभी मन होता है तो वल्र्ड लाइफ की फोटोग्राफी कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि छतरपुर के गांधी आश्रम आकर उन्हें अच्छा लग रहा है। इसलिए मन करता है कि यहां पर भी कुछ समय गुजारूं।