
तराशने के बाद उभरा प्रकृति का रुप
छतरपुर. केन नदी पत्थरों में ‘रंगीन चित्रकारी’ करती है। इस नदी में मिलने वाले दुर्लभ पत्थर बेहद खूबसूरत होते हैं जो अपने भीतर दिखने वाली खूबसूरती के लिए मशहूर हैं। इन पत्थरों को ‘शजर’ कहा जाता है। फारसी में शजर पेड़ को कहा जाता है। खास बात यह है कि कोई भी दो शजर पत्थर एक जैसे नहीं होते, मतलब हर एक पत्थर में अलग-अलग चित्रकारी। दुनिया भर में शजर पत्थर सिर्फ भारत की दो नदियों केन और नर्मदा में ही पाए जाते हैं। अरब देशों में इस पत्थर को ‘हकीक’ और भारत में ‘स्फटिक’ कहते हैं।
केन नदी में पाया जाने वाला शजर पत्थर खूबसूरत तो होता ही है, इसका धार्मिक महत्व भी कम नहीं है। मुसलमान जब हज पर जाते हैं तो इसे साथ लेकर जाते हैं और इस पर कुरान की आयतें लिखवाते हैं। हिंदू व अन्य समुदाय के लोग इस पत्थर को सोने-चांदी की अंगूठी में जड़वाकर पहनते हैं। अरब देशों में इसे ‘हकीक’ और भारत में स्फटिक कहा जाता है। छतरपुर के ज्योतिषाचार्य गुलाब रावत का कहना है कि शजर यानी स्फटिक पत्थर को धारण करने से लोगों की बिगड़ी तकदीर बन जाती है। यह बुद्धि का विकास करने के साथ ही कई बीमारियों से बचाता है। स्फटिक माला या फिर इस पत्थर को तिजोरी में रखने से व्यापार में जबर्दस्त लाभ होता है। नौगांव बलभद्र लाइब्रेरी के प्रभारी दिनेश सेन का कहना है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में ब्रिटेन की महारानी क्वीन विक्टोरिया के लिए दिल्ली दरबार में नुमाइश लगाई गई थी। इसमें रानी विक्टोरिया को शजर पत्थर इतना पंसद आया था वह इसे अपने साथ ब्रिटेन भी ले गई थीं।
कमलेश सोनी के मुताबिक पूर्वजों से मिली जानकारी के अनुसार शजर की खोज करीब 400 साल पहले बांदा में हुई थी। इसे खोजने वाला एक अरब था । वह इसके रंग-बिरंगे डिजाइनों से मंत्रमुग्ध हो गया जो पत्तियों और पेड़ों की तरह दिखते हैं और इसलिए उसने इसका नाम सजऱ रखा (अरबी में इसका मतलब पेड़ होता है)। क्षेत्रीय स्पर्श के कारण सजऱ शजर बन गया। इसे उर्दू में हकीक और हिंदी में स्फटिक कहा जाता है । शजर पत्थर शिल्प को 2023 में जीआई टैग प्रदान किया गया।
शजर पत्थर की पहले कटाई और घिसाई होती हैं, जिसके बाद इसे मनचाहे आकर में ढाला जाता है। सोने चांदी में जडऩे के बाद शजर की कीमत और बढ़ जाती है।
द्वारका प्रसाद सोनी, हस्तशिल्पी
Published on:
22 Aug 2024 10:45 am
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