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बछौन में है 500 साल पुराना कालका माई मंदिर, कुशवाहा समाज के लोग करते है पूजा

चंदला के बछौन गांव में स्थित 500 साल पुराना कालका माई का मंदिर धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है, खासकर कुशवाहा समाज के लिए। यह मंदिर चंदला-खजुराहो मार्ग पर ग्राम पंचायत बछौन से लगभग 1 किलोमीटर की दूरी पर, बिलहरी रोड के किनारे एक विशाल पहाड़ी पर स्थित है।

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kalka mai

कालका माता बछौन

छतरपुर. चंदला के बछौन गांव में स्थित 500 साल पुराना कालका माई का मंदिर धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है, खासकर कुशवाहा समाज के लिए। यह मंदिर चंदला-खजुराहो मार्ग पर ग्राम पंचायत बछौन से लगभग 1 किलोमीटर की दूरी पर, बिलहरी रोड के किनारे एक विशाल पहाड़ी पर स्थित है। गांव के बुजुर्गों के अनुसार, यह मंदिर 500 वर्षों से भी अधिक पुराना है और इसकी खोज कुशवाहा समाज के एक चरवाहे द्वारा की गई थी।

मंदिर की स्थापना की कहानी


लोकमान्यता के अनुसार, एक चरवाहे ने पहाड़ी से बांस का पेड़ उखाडक़र अपने घर ले आया। उसी रात उसे मां कालका देवी ने स्वप्न में आकर बताया कि जहां से उसने बांस का पेड़ उखाड़ा है, वहां उनके निवास का स्थान है और उसे वहां खुदाई कर पूजा अर्चना करनी चाहिए। अगले दिन उसने यह बात ग्रामवासियों को बताई। कुछ लोगों ने विश्वास किया और उसके साथ जाकर खुदाई की, जिसमें मां कालका की मूर्ति प्राप्त हुई। इसी स्थान पर अब विशाल मंदिर का निर्माण हो चुका है।

पूजा और समाज की भूमिका


मंदिर की पूजा-अर्चना विशेष रूप से कुशवाहा समाज के लोगों द्वारा की जाती है। यही समाज यहां के पुजारी बनते हैं और धार्मिक कार्यों का संचालन करते हैं। मंदिर के पुजारी राधे बाबा के अनुसार, चैत्र और कुंवार के नवरात्रि और पूर्णिमा के दिनों में यहां विशेष पूजा होती है। इसके अलावा, श्रद्धालुओं की भीड़ सालभर बनी रहती है। अष्टमी की रात यहां विशाल जत्रा का आयोजन होता है, जहां दूर-दूर से भक्त अपनी अर्जियां लेकर आते हैं।

मंदिर का विकास और प्रबंधन


मंदिर के विकास के लिए ग्रामवासियों ने 'जय मां कालका मेला समिति' का गठन किया है, जो मंदिर और मेले के आयोजन का प्रबंधन करती है। मंदिर से जुड़े लाखों श्रद्धालुओं का साल भर आना जाना लगा रहता है, लेकिन नवरात्रि में विशेष भीड़ उमड़ती है। मंदिर आसपास के क्षेत्र के लोगों के लिए आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है।

विशेष धार्मिक आयोजन और मान्यता


मंदिर में चैत्र और कुंवार की नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा होती है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। अष्टमी की रात विशाल जत्रा का आयोजन होता है, जहां भक्त अपनी मन्नतें लेकर आते हैं और मां कालका के समक्ष अर्जियां रखते हैं। मान्यता है कि यहां मां कालका अपने भक्तों की हर मन्नत पूरी करती हैं।

मंदिर का विकास


समय के साथ, इस धार्मिक स्थल के महत्व को देखते हुए ग्रामवासियों ने 'जय मां कालका मेला समिति' का गठन किया, जो मंदिर के विकास और मेले के आयोजन का प्रबंधन करती है। मंदिर के पुजारी, ग्रामीणों और समिति के सहयोग से मंदिर का विस्तार और विकास किया जा रहा है, ताकि यह स्थल और अधिक श्रद्धालुओं को आकर्षित कर सके।

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