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नारी सम्मान और सशक्तिकरण के तीन रूप आए सामने, बेटी, वधू और मां

- वर्तमान परिवेश में नारी की भूमिका' पर हुआ शहर की महिलाओं ने आध्यात्मिक तरीके से किया चिंतन

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Chhatarpur

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छतरपुर। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर शहर के ब्रह्माकुमारी विद्यालय द्वारा महिला सम्मेलन का अनोख आयोजन किया गया। इस आयोजन में खास बात यह रही कि नारी के सम्मान, सुरक्षा और उसके अस्तित्व पर आध्यात्मिक रूप से न सिर्फ चिंतन हुआ बल्कि सभी समस्याओं का समाधान भी आध्यात्म के माध्यम से खोजा गया। इसके साथ ही नारी की भूमिका पर भी चर्चा हुई। इस खास आयोजन में शहरक प्रतिष्ठित महिलाओं के साथ बड़ी संख्या में समाज से महिलाएं शामिल हुईं।
विश्व महिला दिवस पर 'वर्तमान परिवेश में नारी की भूमिका' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। किशोर सागर स्थित आश्रम में किया गया। इस मौके पर नगर पालिका अध्यक्ष अर्चना सिंह, महिला कांग्रेस जिला उपाध्यक्ष अंजना चतुर्वेदी, दिल्ली पब्लिक स्कूल की प्राचार्या पांचाली दास, डॉ. गायत्री नामदेव, बीएड कॉलेज की प्रोफेसर विनीता गुप्ता एवं नगर के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्यरत सामाजिक महिलाएं और ब्रह्माकुमारी विद्यालय की स्थानीय सेवा केन्द्र संचालिका बीके शैलजा, बीके माधुरी, बीके रीना उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए बीके शैलजा ने नारी की वर्तमान स्थितिपर प्रकाश डालते हुए कहा कि जहां नारियों ने विभिन्न क्षेत्रों में विकास किया है वहीं नारी की स्थिति आंतरिक रूप से अभी भी कमजोर है और इसके लिए नारी स्वयं जिम्मेदार है। नारी के वास्तविक सशक्तिकरण के लिए स्वयं की शक्तियों को पहचनने की आवश्यक्ता है। इस मौके पर सभी अतिथियों अपने-अपने विचार रखते हुए कार्यक्रम की सराहना की एवं शुभकामनाएं प्रदान कीं। बीके माधुरी ने सभा को राजयोग का अभ्यास कराया एवं बीके रीना ने मंच संचालन किया।
नारी सम्मान और शक्तिकरण पर भी हुई चर्चा :
समारोह में नगरपालिका अध्यक्ष अर्चना सिंह ने कहा कि परिवार, समाज की छोटी इकाई है। किसी देश अथवा समाज में जैसे परिवारों की हालत होगी, वैसी ही उस देश अथवा समाज की हालत होगी। अगर परिवार के सदस्य सुसभय या सुशिक्षित होंगे तो वह देश भी अच्छी सभ्यता वाला देश कहा जाएगा। परिवार की महत्वपूर्ण इकाई नारी है। नारी के बिना परिवार की कल्पना भी नहीं कर सकते हैँ। बेटी, पत्नी, मां, बहन हर रूप में नारी का योगदान अमूल्य होता है।
नारी के तीन रूप मुख्य होते हैं :
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी संस्था के क्षेत्रीय अध्यक्षा बीके शैलजा ने नारी के तीन मुख्य रूपों पर बात रखी। उन्होंने बताया कि नारी विद्यास्वरूपा, शक्ति स्वरूपा, आध्यात्म स्वरूपा होती है। इसके अलावा उन्होंने नारी के तीन किरदार कुछ इस तरह रखे।
1. बेटी के रूप में नारी : मनोवैज्ञानिकों का अनुमान है कि नारी अपनी छोटी उम्र में जब बालिका के रूप में होती है तो वह बालकों की अपेक्षा अधिक आज्ञाकारी, अनुशासित और पारिवारिक जिम्मेदाररियों के प्रति अधिक जागरुक होती है। कन्याओं की पवित्रता कुमारों की अपेक्षा अधिक होती है। इसलिए भारत में कुमारियेां को पूजा जाता है। कन्या सौ ब्राह्मणों से उत्तम बताई जाती है। पुराने समय में तो बालिका के नाम के साथ देवी शब्द का प्रयोग किया जाता था। जैसे कमला देवी, सीता देवी आदि।
2. वधु के रूप में नारी : नारी जब दूसरे घर में वधू बनकर जाती है तो यह उसके त्याग और समर्पण की पराकाष्ठा है। विवाह के बाद एक नारी के लिए सब कुछ बदल जाता है। यह जैसे कि एक तरह से उनका मरकर दोबारा जन्म लेना है। वह दूसरे घर के रीति-रिवाजों, प्रथाओं और मान्यताओं के बीच सामंजस्य बैठाती हैं। नए माहौल, नए वातावरण, नये सदस्यों के स्वभाव-संस्कार के अनुरूप वह अपने को ढालती है। आज भी परिवार में वधू को लक्ष्मी का संबोधन दिया जाता है। लक्ष्मी अर्थात जो अपने अच्छे लक्षणों से घर-परिवार में समृद्धि और संपन्नता लाती है।
3. मां के रूप में नारी : मां के रूप में नारी की ममता अद्वितीय मिसाल है। बच्चे के सुख के लिए मां हर प्रकार का त्याग करने के लिए तत्पर रहती है। वह अपनी भूख, प्यास, नींद और आरम को भ्ज्ञी भूलकर अपने बच्चों और परिवार के सुख के लिए अपना समय लगाती है। देखा जाए तो संसार के हर व्यक्ति की रचयिता एक नारी ही है। मां के रूप में नारी का योगदान समाज में अमूल्य होता है। मां-बच्चे की प्रथम गुरू है। बच्चे को अच्छे संस्कार देने में मां की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इतिहास साक्षी है कि विश्व के महान से महान चरित्र जैसे कि बालक धु्रव, वीर शिवाजी, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, लालबहादुर शास्त्री, महात्मा गांधी, लाल लाजपत राय, महाराज छत्रसाल को गढऩे में इनकी माताओं का सबसे बड़ा योगदान रहा है।