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कोरोना काल में इस सरकारी अस्पताल में रेमेडसिविर इंजेक्शन को लेकर हुई थी ₹ 25 लाख से ज्यादा की गड़बड़ी

अधिकारियों ने हमेशा छिपाने की कोशिश की

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छिंदवाड़ा। कोरोना की वैक्सीन लगाए जाने के बाद से ही कोरोना काफी हद तक लोगों पर अपना खास असर दिखाने में कमजोर साबित हो रहा है। वहीं साल 2021 में जब तक सभी को कोरोना वैक्सीन नहीं दी जा सकी थी तब तक कोरोना ने कोहराम मचा रखा था। उस समय रेमेडसिविर इंजेक्शन की मांग अत्यधिक बड़ गई थी, ऐसे में इसकी कमी न हो इसे देखते हुए भी विभिन्न अस्पतालों ने इसे अपने पास मंगा कर रख लिया था।

लेकिन प्रदेश के एक ऐसे सरकारी अस्पताल का भी अब कहीं जाकर खुलासा हुआ है, जहां इस दौरान कोराना का भय दिखाते हुए पीडि़तों की जान बचाने के नाम पर रेमेडसिविर इंजेक्शन की खरीदी के चलते 25 लाख रुपए से ज्यादा की गड़बड़ी हुई।

दरअसल साल 2021 के अप्रैल-मई में जब कोरोना संक्रमण प्रभावी था, तब जिला अस्पताल की रोगी कल्याण समिति के माध्यम से आनन-फानन में रेमेडसिविर इंजेक्शन खरीदे गए और उसका वितरण भी किया गया। इसी आपाधापी में 25 लाख रुपए से ज्यादा की गड़बड़ी की गई। इसे समिति की वित्तीय रिपोर्ट में दिखाया गया है। फिलहाल इस वित्तीय गड़बड़ी की जांच के लिए कोई टीम गठित नहीं की गई है।

बताया जाता है कि रोगी कल्याण समिति की फरवरी में हुई बैठक में इस वित्तीय प्रतिवेदन को रखा गया था। इस पर प्रशासन, अस्पताल के अधिकारियों और डॉक्टरों ने चर्चा की थी।

प्रतिवेदन से साफ था कि रोगी कल्याण समिति ने अप्रैल से दिसंबर 2021 तक 2.91 करोड़ रुपए की आय दिखाई, वहीं 2.95 करोड़ रुपए खर्च होना दिखाया। ये आय-व्यय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे कोरोना संक्रमण में सरकारी खर्च का ब्यौरा पहली बार सामने आया है। जिसे अधिकारियों ने हमेशा छिपाने की कोशिश की है।

आय-व्यय में ये दिखा अंतर
इस नौ माह की वित्तीय रिपोर्ट को देखा जाए तो रोगी कल्याण समिति द्वारा रेमेडसिविर इंजेक्शन खरीदने के लिए 63,61638 रुपए का भुगतान दिखाया गया है तो वहीं इस भुगतान के नीचे 36 लाख 76 हजार रुपए मॉयलान व बायोफेज फर्म को अग्रिम भुगतान होना बताया गया है।

इस तरह यह राशि एक करोड़ 37 हजार 638 रुपए होती है। जबकि रेमेडसिविर इंजेक्शन को बेचने से प्राइवेट अस्पताल से आय 60,78320 रुपए, मॉयलान व बायोफेज फर्म से क्रमश: राशि की वापसी 9,40797 और 443232 रुपए बताई गई है।

इन दोनों आय और व्यय को देखा जाए तो दोनों में 2575289 रुपए का अंतर आ रहा है। इसकी भरपाई के बारे में समिति से जुड़े पदाधिकारी कुछ नहीं कह रहे हैं।

इस हिसाब-किताब में गड़बड़ी पर जांच टीम गठित नहीं की गई है। जांच से ये पता चल सकता है कि कहीं रेमेडसिविर इंजेक्शन के नाम पर रोगी कल्याण समिति को 25 लाख रुपए से ज्यादा का चूना तो नहीं लगाया गया है।

ऑक्सीजन प्लांट के 61 लाख, ऑक्सीजन के 44
इस वित्तीय प्रतिवेदन से यह भी स्पष्ट हुआ कि कोरोना संक्रमण से
निपटने ऑक्सीजन प्लांट के लिए सरकार से 61 लाख 56 हजार 866 रुपए मिले थे। इसी तरह प्लाज्मा मशीन 13.12 लाख तथा कोविड बाइपेप मशीन के लिए 21.11
लाख रुपए आए थे। कोविड ऑक्सीजन के 44.12 लाख रुपए तथा मास्क पर खर्च के लिए 4.47 लाख रुपए सरकार से आए थे।

कोरोना मौतों का छिपाया था आंकड़ा....
पिछले दो साल के कोरोना संक्रमण में हजारों लोगों ने जान गंवा दी लेकिन प्रशासन ने केवल 120 मौतों की अधिकारिक पुष्टि की। इसकी पोल तब खुली,जब खुद प्रशासनिक अधिकारियों ने कोरोना मृतकों के 529 केस में 50-50 हजार रुपए दिए। अब कोरोना संक्रमण से निपटने से खर्च राशि का ब्योरा उजागर हुआ है। वहीं ऐसे में रेमेडसिविर इंजेक्शन का हिसाब न मिलना सवालिया निशान छोड़ गया है।

कोरोना संक्रमण के समय रेमेडसिविर इंजेक्शन और अन्य सामग्री की खरीदी मेरे कार्यकाल के समय नहीं हुई थी। उस समय यह सब राजस्व विभाग के अधीन था। जानकारी के अनुसार इंजेक्शन का आय-व्यय व्यवस्थित है।
- डॉ. शिखर सुराना, सिविल सर्जन जिला अस्पताल

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