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विश्व धरोहर दिवस..सोलहवीं शताब्दी का गवाह देवगढ़ किला तो 6 मिलियन वर्ष पुरानी पातालकोट की घाटी

इतिहास के पन्नों में दर्ज है जिले की एतेहासिक धरोहरों की गाथाएं, संरक्षण के लिए उठाने होंगे कदम

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छिंदवाड़ा.विश्व धरोहर दिवस 18 अप्रैल को जब पूरा विश्व अपने एतेहासिक एवं सांस्कृतिक स्थलों के संरक्षण के प्रति जागरुकता की वकालत कर रहा होगा, तब छिंदवाड़ा के पास भी गर्व करने लायक सोलहवीं शताब्दी का देवगढ़ का किला होगा तो वहीं छह मिलियन वर्ष पुरानी पातालकोट की घाटी होगी। बस स्मार्टफोन और इंटरनेट में खोई नई पीढ़ी को इसका एहसास कराना होगा।
एतेहासिक धरोहर के संदर्भ में देखा जाए तो प्रदेश के बड़े जिलों में शुमार छिन्दवाड़ा 11,815 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ विशाल भू-भाग ही नहीं है बल्कि अपने अंदर प्राकृतिक, एतेहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को समेटे है,जहां शताब्दियों का इतिहास भरा पड़ा हैं। जिले का हर नागरिक इन स्थलों पर पहुंचकर इन धरोहरों को देख लें तो पर्यटन की नई शुरूआत होगी बल्कि रोजगार के अवसर भी विकसित होंगे।
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गोंड राजाओं की शानदार विरासत देवगढ़
देवगढ़ किला विकास खंड मोहखेड़ के देवगढ़ ग्राम में 650 मीटर ऊंची एक पहाड़ी पर स्थित है। किला 16वीं सदी में गोंड राजाओं द्वारा निर्मित माना जाता है। देवगढ़ का कोई प्रत्यक्ष लिखित इतिहास नहीं है परंतु बादशाहनामा व अन्य मुगल साहित्य में देवगढ़ की चर्चा की गई है। अकबर के समय देवगढ़ पर जाटवा शाह राज्य करता था। किला में बावलियों एवं बारहमासी पहाड़ी झरनों से गिरनेवाली बूंदों से भरनेवाले मोती टांका को देखा जा सकता है।
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उत्कृष्ट पाषाण कारीगरी का नमूना गोदड़देव
गोदड़देव उत्कृष्ट पाषाण कारीगरी का नमूना है। कनकधाम वर्षपर्यन्त धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम है। तुलतुला पहाङ़, छोटा महादेव, अनहोनी, सतधारा, मुत्तोर बन्धान, ग्वालगढ़ के शैलचित्र, पाइन गार्डन, भूराभगत, जुन्नारदेव विशाला की पहली पायरी, गैलडुब्बा, बन्दरकूदनी, बादलभोई आदिवासी संग्रहालय, सिल्लेवानी की घाटियां सहज ही पर्यटकों को आकर्षित करती है। इन्हें कहीं न कहीं इतिहास के पन्नों में पाया जा सकता हैं।
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पातालकोट में छह मिलियन वर्ष पुराना इतिहास
राज्य सरकार ने वर्ष 2019 के राजपत्र में पातालकोट को जैव विविधता विरासत स्थल घोषित किया। उससे पता चलता है कि यह स्थल 1700 फीट गहरी घाटी तथा 6 मिलियन वर्ष की अनुमानित आयु वाला पारिस्थितिकी एवं दुर्लभ वनस्पति तथा प्राणियों वाला क्षेत्र है । जिसमें ब्रायोफा इट्स एवं टेरिडोफ गइटस भी है । इस क्षेत्र के समुदाय विशेषकर भारिया को जंगली पेड़ पौधे एवं जड़ी बूटियों का अनोखा पारंपरिक ज्ञान है जिसका उपयोग वे औषधियां प्रभावी बनाने करते हैं ।
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ये भी हमारी एतेहासिक धरोहर
1.नगर पालिका छिन्दवाड़ा की स्थापना सन् 1867 में हुई और नगर में टाऊन हॉल 1903 में बना। यह इमारत भी अपना गौरवशाली अतीत की गवाह हैं।
2.छोटा तालाब का निर्माण 1857 में तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर श्री असवर्नर ने कराया था।
3.हिंदी प्रचारिणी समिति की स्थापना 1935 में हुई । इस पर अभी भी सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियां संचालित हो रही है।
4.छिन्दवाड़ा में श्रीराम मंदिर, सीताराम मंदिर, राधाकृष्ण मंदिर, नरसिंह मंदिर का निर्माण सन् 1860 में किया गया। ये मंदिर भी शहर की धार्मिक पहचान हैं।
5.छिन्दवाड़ा में चर्च 1895 और गुरुद्वारा 1918 और जैन मंदिरों का निर्माण 1895 में हुआ। ये भी अपनी एतेहासिकता से परिचित कराते हैं।
6. छिन्दवाड़ा में आदिवासी संग्रहालय की निर्माण 1956 में हुआ । जिसमें भारिया जनजाति के जीवन पर केन्द्रित सामग्री रखी हुई है।
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