कभी दुर्ग के परकोटे में सिमटा हुआ चित्तौड़ शहर अब गंभीरी नदी की पुलिया की सीमा पार करते हुए क्रंकीट के जंगल में बदल रहा है। शहर का एक हिस्सा सेगवा-बोजुन्दा गांव तक पहुंच रहा है तो दूसरा हिस्सा पुठौली व नरपत की खेड़ी की सीमा में पहुंच रहा है।
चित्तौड़ शहर की बीस सालों में 65 फीसदी आबादी बढऩे का क्या हो रहा असर
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चित्तौैडग़ढ़. कभी दुर्ग के परकोटे में सिमटा हुआ चित्तौड़ शहर अब गंभीरी नदी की पुलिया की सीमा पार करते हुए क्रंकीट के जंगल में बदल रहा है। शहर का एक हिस्सा सेगवा-बोजुन्दा गांव तक पहुंच रहा है तो दूसरा हिस्सा पुठौली व नरपत की खेड़ी की सीमा में पहुंच रहा है। दुर्ग के पीछे के क्षेत्र घटियावाली तक सूरजपोल तक शहर की बस्तियां आबाद हो रही है। सीमित धरती पर बढ़ते जनसंख्या भार का सीधा असर विकास पर हो रहा है। कृषि भूमि सीमित हो रही है तो विकास के नाम पर क्रंकीट के जंगल खड़े करने से पेड़ भी कटते जा रहे है। ऐसे में जल संकट से लेकर खाद्यान्न तक का संकट सामने आ रहा है। करीब 41.8 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले चित्तौड़ शहर की आबादी गत दो दशक में तेजी से बढ़ी है। इस अवधि में शहर की आबादी करीब 65 फीसदी तक बढ़ गई। शहर की आबादी 1991 में 71 हजार 569 थी जो बीस वर्ष बाद 2011 में1 लाख16 हजार 404 तक पहुंच गई। अनुमान है कि वर्तमान में शहर की आबादी करीब एक लाख 30 हजार तक हो चुकी है। जनसंख्या घनत्व भी प्रति वर्ग किलोमीटर 2 हजार 788 तक पहुंच गया है।
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क्यों हुआ शहर में आबादी विस्तार
चित्तौड़ शहर की आबादी तेजी से बढऩे के पीछे मुख्य कारण बढ़ता औद्योगिकीकरण है। गत दो दशक में शहर के आसपास कई औद्योगिक इकाईयां स्थापित हुई है। ऐसे में उनमें हजारों लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त होने से देश के विभिन्न क्षेत्रों से यहां लोगों का बसने के लिए पहुंचना शुरू हो गया। मार्बल उद्योग में बड़ी संख्या में रोजगार सृजन होने से भी शहर में जनसंख्या विस्तार तेजी से हुआ।
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कृषि भूमि बदल गई आवासीय में
सीमित धरा पर बढ़ते आबादी के भार का दुष्प्रभाव ये हुआा है कि शहर में कुछ वर्षो पहले जिन क्षेत्रों में कृषि भूमि थी उसे आवासीय एवं व्यवसायिक में रूपान्तरित कराया जा रहा है। पिछले दो दशक में आबाद शहर की कई बस्तियां ऐसी भूमि पर बसी हुई जो पहले कृषि के काम आती थी। खेती की जमीन पर क्रंकीट के मकान खड़े कर देने से खाद्यान्न व सब्जी उत्पादन पर भी अप्रत्यक्ष नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
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विकास के नाम पर काट दिए पेड़
शहर में तेजी से बढ़ी आबादी के कारण बसी नई कॉलोनियों में कृषि भूमि समाहित होने के साथ हजारों वृक्षों को भी काटा गया। कॉलोनियों में रोड विस्तार, शहर की सड़कों चौड़ा करने आदि के नाम पर भी पेड़ो की बलि चढ़ी। पेड़ो को काट देने का दुष्प्रभाव शहर के पर्यावरण पर भी पड़ा। सीमित धरा पर भी खण्ड वृष्टि के हालात बनने के पीछे इसी तरह के कारण जिम्मेदार माने जाते है।