
करीब 58 वर्ष पहले वो भी एक दौर था जब शहर के लोगों की दिनचर्या शहर के सफेद घंटाघर के घंटों से आवाज से शुरू होती थी। सुबह उठने से लेकर रात को सोने के अलावा दिन में कहीं बस-ट्रेन से सफर कर दूसरे गांव जाना हो या फिर कोई जरूरी काम हो।
सफेद घंटाघर के घंटों की आवाज सुनकर लोग समय पता करते थे। आज भी घंटाघर की घडिय़ों के घंटों की आवाज लोगों को पिलानी के औद्योगिक घराने बिरला परिवार की याद दिलाती है।
बीते 58 वर्षों के इतिहास को समेटे खड़े शहर के सफेद घंटाघर का निर्माण राजा बलदेवदास व छोगी देवी के पुत्रों ने विक्रम सम्वत 2014 में अपने माता-पिता की आज्ञा से चूरू निवासी अपने नाना सेठ लालजी सिंघी की स्मृति में करवाया था।
उस समय जब शहर की आबादी इतनी नहीं थी और चारों तरफ बहुमंजिला इमारतें नहीं थी, तब इसकी आवाज शहर के चारों कोनों में दूर-दूर तक सुनाई देती थी। वर्तमान में इसकी देखरेख नगर परिषद प्रशासन कर रहा है।
धर्म की शिक्षा भी दे रहा घंटाघर
आमजन को समर्पित शहर का सफेद घंटाघर नैतिकता और धर्म के पतन के इस दौर में धर्म की भी शिक्षा दे रहा है। घंटाघर के चारों तरफ लिखे रामायण के विभिन्न प्रसंगों का हिन्दी अनुवाद व उपनिषदों के संस्कृत श्लोक यहां रुकने वालों को धर्म की शिक्षा दे रहे हैं।
राहगीरों की है शरणस्थली
शहर का घंटाघर थके हारे राहगीरों की शरणस्थली भी बना हुआ है। यहां लगे बरगद के विशाल पेड़ की ठंडी छांव के नीचे थके हारे लोग आराम कर राहत पाते हैं। चारों तरफ लगने वाले अस्थाई हाट बाजार से लोगों को रोजगार मिला हुआ है।
Published on:
29 Jul 2016 06:19 pm
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