
स्वाद विजय का श्रेष्ठतम उपाय आयंबिल तप
कोयम्बत्तूर. आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि मनुष्य के पास आंख, नाक व कान दो-दो इंद्रियां हैंं लेकिन जीभ एक ही है जिससे दो कार्य होते हैं-स्वाद व बोलना। जीभ में अमृत भी है और जहर भी। पूर्ण अंकुश है तो यह वरदान है और अंकुश न हो तो यह श्राप बन जाती है।
उन्होंने शुक्रवार को बहुफणा पाश्र्वनाथ जैन भवन Coimbatore में आहार विषय पर आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि वाणी के क्षेत्र में निरंकुश जीभ जिस प्रकार सामाजिक जीवन में भयंकर आंधी ला सकती है, इसी प्रकार स्वाद के क्षेत्र में भी अंकुश न हो तो वह जीवन के स्वास्थ्य में आग लगा सकती है। संयम साधना के लिए इंद्रीय दमन आवश्यक है। इसमें सर्वाधिक भार रसना जय में है। अन्य इंद्रियों की पुष्टता भी रसनेन्द्रिय करती है। इसका सर्वश्रेष्ठ उपाय आयंबिल तप है। आयंबिल में प्रत्येक प्रकार के स्वाद का त्याग है। भोजन रसों का त्याग होता है। दूध, दही, घी, तेल व मिष्ठान, फल व मेवे आदि का त्याग होता है। उन्होंने कहा कि आयंबिल तप में रस का त्याग व नीरस भोजन का सेवन करना भी है।
उपवास में सभी प्रकार के आहार का त्याग है जबकि आयंबिल में रस युक्त भोजन का त्याग व रसहीन का सेवन करना है। उपवास निरंतर नहीं किया जा सकता जबकि आयंबिल तक आजीवन किया जा सकता है। आयंबिल में २४ घंटे में एक बार तप करना होता है। भोजन भी सात्विक होता है। शरीर के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए आवश्यक व शक्तिदायक तत्व आयंबिल के भोजन से प्राप्त कर सकते हैं। इस कारण आयंबिल का तपस्वी दीर्घकाल तप का आचरण करते हुए भी जीवन में स्फूर्ति देता है।
आचार्य ने कहा कि रसा रोगस्य कारणम, रस ही रोग के कारण हंै। आयंबिल में बाह्य तपों की आराधना होती है।
एक बार भोजन के बाद शेषकाल में अनशन तप की आराधना होती है। आयंबिल में रसहीन भोजन से उणोदरी का आचरण स्वत: ही हो जाता है। आयंबिल में छह विगई का त्याग होने से रस त्याग की आराधना हो जाती है।
Published on:
14 Sept 2019 11:57 am
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