
आखिर क्यों बढ़ रही है दक्षिण के हिल स्टेशन ऊटी में गर्मी? जानिए ...
कोयम्बत्तूर. दक्षिण South India में पहाड़ों की रानी Queen of Hills के नाम से विश्रुत ऊटी Ooty देशी-विदेशी सैलानियों का पसंदीदा स्थल है। यहां का pleasant weather हल्की सर्दी वाला मौसम सैलानियों के आकर्षण का मुख्य कारण है। लेकिन, प्रकृति का स्वर्ग कहे जाने वाले ऊटी में मौसम का मिजाज बदल रहा है। तेजी से हो रहे विकास और जलवायु परिवर्तन climate change का असर यहां के तापमान temperature पर भी पड़ा है। कभी सर्द मौसम के चर्चित रहे ऊटी में गर्मी की तपिश धीरे-धीरे बढ़ रही है। पिछले तीन दशकों में ऊटी में गर्मी बढ़ी है।
केंंद्र सरकार के एक संस्थान की नवीनतम अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक 90 के दशक के बाद से ऊटी में गर्मी बढ़ी है। इस रिपोर्ट में 1960 से लेकर 2018 तक हर साल में Summer गर्मी और Winter सर्दी के मौसम के तापमान का तुलानात्मक अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 1990 के बाद औसत से ज्यादागर्मी temperature rise वाले वर्षों की संख्या बढ़ी है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अधीन आने वाले भारतीय मृदा व जल संरक्षण संस्थान Central Soil and Water Conservation Research Centre ने पिछले 60 साल के आंकड़ों का विश£ेषण किया है। अध्ययन के लिए छह दशकों कोवर्ष 1960 से 1989 और 1990 से 2018 के दो काल खंडों में बांटा गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पहले खंड के तीन दशकों में सिर्फ दो वर्ष ही ऐसे रहे जब औसत सामान्य तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा दर्ज किया गया लेकिन दूसरे काल खंड के तीन दशकों में ऐसे वर्षों की संख्या बढ़कर 15 हो गई। बदलते मौसम के बीच भी इस साल आयोजित ग्रीष्मकालीन उत्सव के दौरान रिकार्ड संख्या में सैलानी ऊटी आए थे। दो महीने में 10.6 लाख से ज्यादा लोग ऊटी वनस्पति उद्यान आए।
केंद्र के मुख्य वैज्ञानिक एस मणिवन्न कहते हैं कि पहले तीन दशकों की तुलना में पिछले तीन दशकों में ऊटी का तापमान 0.6 डिग्री सेल्यिस बढ़ा है। पहले एक दशक के दौरान ऊटी में 0 से 2 अधिक गर्मी वाले वर्ष होते थे लेकिन अब एक दशक में ऐसे वर्षों की संख्या बढ़ कर छह तक हो गई है।
क्या हैं बदलाव के कारण
वैज्ञानिकों का कहना है कि ऊटी में औसत से अधिक गर्मी वाले वर्षों की संख्या बढऩे मे जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग बड़ा कारक है। अध्ययन में कहा गया है ऊटी में पुराने वाहनों के प्रयोग को सीमित किया जाना चाहिए ताकि कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित किया जा सके। अध्ययन में कहा गया है कि हरित क्षेत्र बढ़ाए जाने के साथ ही भारत स्टेज-1,2,3 के वाहनों के परिचालन को नियंत्रित किया जाना चाहिए। पुराने वाहनों को उन्नत किया जाना चाहिए ताकि उत्सर्जन के मापदंडों का पालन किया जा सके। इसके साथ ही वैज्ञानिकों का सुझाव है कि आम लोगों और किसानों को वर्षा जल संरक्षण के प्रति भी जागरुक किया जाना चाहिए।
क्या होगा इसका असर
वैज्ञानिकों का कहना है कि मौसम के मिजाज में बदलाव का खेती से लेकर आम लोगों के जीवन तक पड़ेगा। इससे पारिस्थितिकी प्रभावित होने के साथ ही पानी की उपलब्धता भी पड़ेगा। तापमान बढऩे से सर्दी और कुहरे वाले दिन भी बढ़ेंग।
Published on:
27 Jun 2019 12:56 pm
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