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इंटरनेट के लिए ये हैं आपके मौलिक अधिकार

संविधान द्वारा नागरिकों को जीने का अधिकार प्राप्त है, इसमें इंटरनेट तक पहुंच भी शामिल है

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Anil Kumar

Jan 03, 2016

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नई दिल्ली। इंटरनेट की दुनिया में नेट न्यूटे्रलिटी बहुत प्रासंगिक विषय बन गया है। इस मसले पर भारत का रुख क्या रहे, वर्ष 2015 में इसे लेकर बहुत चर्चा और बहस हुई। फिलहाल गेंद सरकार के पाले में है। दिसंबर माह में ट्राई ने निर्देश दिए कि जब तक वह निर्धारित नहीं कर लेता कि फेसबुक का फ्री बेसिक्स कार्यक्रम नेट न्यूट्रेलिटी का उल्लंघन है या नहीं, तब तक सर्विस प्रदाता फ्री बेसिक्स मुहैया नहीं कराएं। इस तरह फ्री बेसिक्स कठघरे में आ गया और नेट न्यूट्रेलिटी पर जमकर बहस चल रही है। पर हमें अभी तक सरकार द्वारा नेट न्यूटे्रेलिटी पर कोई विस्तृत नीति पेश करने का इंतजार है। हालांकि भारतीय नागरिकों को मुहैया कराए जाने वाली किसी भी मुफ्त सेवा अपनाने या उससे इनकार से पहले पूरे तथ्यों का विश्लेषण अवश्य कर लेना चाहिए।


भारत के लिए सवाल यह है कि क्या यह अपनी प्रभुता को बंधक बनने देना चाहता है? क्या यह अपने नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित होने देना चाहेगा? संविधान द्वारा नागरिकों को जीने का अधिकार प्राप्त है, इसमें इंटरनेट तक पहुंच भी शामिल है। मतलब जितना संभव हो सके वहां तक इंटरनेट एक्सेस। इस सिद्धांत का उल्लंघन संवैधानिक वैधता को चुनौती देना है।

भारत एक संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य है। भारत दूसरी बड़ी आबादी वाला देश है। मोबाइल इंटरनेट उपयोक्ताओं की तादाद तेजी से बढ़ रही है। इसलिए नेट न्यूटे्रलिटी की दिशा में निम्न सिद्धांत अपनाना जरूरी है।

1) इंटरनेट वैश्विक विरासत है। इसका इस्तेमाल समाज के विकास के लिए हो न कि खंडन के लिए।
2) इंटरनेट एक कॉमन प्लेटफॉर्म है, जहां लोग आपस में संचार, नवाचार, डेटा, सूचनाओं का आदान-प्रदान, प्रसार-विस्तार करते हैं। इसमें बाधा नहीं आनी चाहिए।
3) नेटीजऩ का हित सर्वोपरि है, इस दिशा में नेट न्यूटे्रलिटी सुनिश्चित होनी चाहिए।
4) यूजर्स को डिजिटल सम्पन्नता और असम्पन्नता में हरगिज नहीं बांटा जाना चाहिए। जहां एक खास सेवा वाले लोगों को इंटरनेट पर अच्छी गुणवत्ता मिले और बाकी लोग उस दायरे से बाहर रहें। यह नेट न्यूटे्रलिटी से सरासर समझौता होगा।
5) मेरा मानना है कि आज इंटरनेट एक्सेस संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत बुनियादी अधिकार में शामिल हो चुका है। इसे सिर्फ कानून द्वारा स्थापित विधि से ही सीमित किया जा सकता है। नेट न्यूटे्रलिटी से समझौता लोगों की ऑनलाइन अभिव्यक्ति की आजादी से समझौता होगा।
6) नेट न्यूटे्रलिटी भारत सरकार के डिजिटल इंडिया कार्यक्रम की आधारशिला है। अगर इसे ठीक ढंग से संचालित नहीं किया तो इसका हानिकारक असर कार्यक्रम पर पड़ेगा।
7) सुप्रीम कोर्ट ने श्रेया ङ्क्षसघल के मामले में फैसले में कहा भी था कि नेट न्यूटे्रलिटी की राह में कोई भी रुकावट ऑनलाइन अभिव्यक्ति को हानि पहुंचा सकती है।
उम्मीद है कि 2015 में शुरू हुई यह बहस 2016 में सरकार द्वारा एक अच्छी नीति के जरिए खत्म होगी। एक ऐसी नीति जिसमें नेट न्यूटे्रलिटी के सिद्धांतों पर स्पष्टता होगी।

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