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पीतल, कांसा घरेलू उद्योग की चमक पड़ती जा रही फीकी, मदद की दरकार

सरकारी संरक्षण न मिलने से कारीगरों का मोह हो रहा भंग, पटेरा में बचे केवल तीन परिवार ही कर रहा कार्य

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Bronze, bronze shining the domestic industry

Bronze, bronze shining the domestic industry

पटेरा. पुराने समय में घरों में पीतल व कांसे के बर्तनों का उपयोग किया जाता था, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहतर थे, लेकिन धीरे-धीरे यह बर्तन स्टील, प्लास्टिक, चीनी मिट्टी के चलन के कारण बाहर हो गए हैं। पूर्व में पटेरा में जहां 30 से 40 कारीगर परिवार हुआ करते थे अब महज तीन परिवार ही शेष बचे हैं। जो इसकी स्वयं मार्केटिंग न करते हुए दुकानदारों के लिए मजदूरी में बर्तन बनाने में लगे हुए हैं।
पटेरा नगर में अशोक लल्लू ताम्रकार, प्रेम ताम्रकार व रामविलास ताम्रकार ही पीतल व कांसे के बर्तन निर्माण का पुश्तैनी धंधा संभाले हुए हैं। पटेरा का पीतल व कांसा घरेलू उद्योग कई इतिहास समेटे हुए हैं। इनकी कई पीढिय़ां कला को जीवित रखे रहीं। इस उद्योग के लिए आजादी से लेकर अब तक किसी भी सरकार या जनप्रतिनिधि ने इसकी चमक बरकार रखने का प्रयास नहीं किया, जिससे यह घरेलू उद्योग अब यहां से विलुप्ती की ओर है।
बुद्धि होती है तेज, रक्त में रहती है शुद्धता
डॉ. केदार शर्मा के अनुसार कांसे के बर्तन में खाना खाने से बुद्धि तेज होती है। रक्त में शुद्धता आती है। रक्तपित्त शांत रहता है, भूख भी बढ़ती है। लेकिन एक बात का ध्यान रखना पड़ता है। कांसे के बर्तन में खट्टी चीजें नहीं परोसनी चाहिए। क्योंकि खट्टी चीजें इस धातु से क्रिया करके विषैली हो जाती हैं, जो नुकसान देता है। पीतल के बर्तन में भोजन पकाने और करने से कृमि रोग, कफ और वायुदोष नहीं होता है।
डिजाइनों पर देते हैं जोर
कारीगर प्रदेश भर से आने वाले दुकानदारों द्वारा नई व डिजाइनों के हिसाब से दहेज के समय सबसे जरूरी माने जाने वाले तीन बर्तन लौटा, बेला व थाली की डिजाइन भी करते हैं।ग्राहकों की डिमांड अनुसार नक्कासी भी कराई जाती है। पीतल के कोपर, हंडी की भी डिमांड विवाह पर दहेज में उपयोग होता है।
शादी तक सीमित
पीतल और कांसा के बर्तनों का पुश्तैनी धंधा शादी विवाह में प्राथमिकता के आधार पर ही पनप रहा है। शुभ मंगल कार्य इन बर्तनों के बिना नहीं होता। हालांकि पूजन पाठ के उपयोग में आने वाले बर्तनों का इस्तेमाल भी पीतल व कांसे से किया जाता है, जिससे इन कारीगारों की रोजी रोटी अब भी बरकार है।
अब केवल मजदूरी पर ही निर्भर
कारीगर पहले रॉ मटेरियल लाकर बर्तनों का निर्माण करते थे। थोक व फुटकर बेचते थे। अब लागत की क्षमता न होने के कारण वह 80 रुपए प्रतिकिलो की मजदूरी के हिसाब से रॉ मटेरियल बनाते हैं। तेजाब का प्रबंध इन्हें करना पड़ता है, जो सागर में ही मिलती है। इस धंधे के विलुप्त होने के पीछे रॉ मटेरियल व तेजाब की उपलब्धता जिले में न होने के कारण कई पुश्तैनी धंधों का पतन होता चला आ रहा है।
बनाते हैं नया
पटेरा के तीन परिवार प्रदेशभर के दुकानदारों के बिकने वाले पुराने बर्तनों के माध्यम से ही रॉ मटेरियल प्राप्त करते हैं। छतरपुर के थोक दुकानदारों द्वारा पुराने पीतल व कांसे के बर्तन दिए जाते हैं। जिन्हें लेकर ये चीचली या उचेहरा जाते हैं, जहां पुराने बर्तनों को गलवाने के बाद उनकी प्लेट बनवाते हैं, इसके बाद नए बर्तनों का निर्माण करते हैं।