गांव के ए श्रेणी के हलवाई सालाना 15 से बीस लाख रुपए तक की बचत कर लेते हैं। यही कारण है कि यह पेशा आज भी युवाओं को आकर्षित कर रहा है। गांव में रमेश, चिरंजी, पूरण कुम्हार, मुकेश कुम्हार, राधेश्याम, कैलाश मावावाला, रामस्वरूप, गजानंद, श्रवण, सीताराम, अशोक , देवनारायण और गोपाल जैसे कई अनुभवी हलवाई अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। अब तो पड़ौसी गांव ढाय व झेरा में भी अनेक हलवाई अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं।