
दौसा में पकवान बनाते हलवाई।
राजेश शर्मा
राजस्थान के दौसा जिला मुख्यालय से करीब 16 किलोमीटर दूर स्थित बिहारीपुरा गांव अपनी अनोखी पहचान के लिए जाना जाता है। गांव में प्रवेश करते ही एक-दो हलवाई काम में जुटे नजर आ जाते हैं और यही इसकी अलग पहचान है। यहां के लोगों के हाथों का स्वाद न केवल दौसा जिले बल्कि देश के कई राज्यों तक प्रसिद्ध है। आलम यह है कि औसतन हर दूसरे घर में एक या उससे अधिक हलवाई मौजूद हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 162 घरों वाले इस गांव की आबादी करीब 1008 है। यहां छोटे बड़े करीब सौ से ज्यादा हलवाई हैं। हालांकि अब रोजगार की तलाश में कई परिवार दौसा, जयपुर सहित अन्य शहरों में बस गए हैं, लेकिन गांव की पहचान आज भी हलवाईगिरी से ही ज्यादा जुड़ी हुई है। यहां के हलवाई गुलाब जामुन, बर्फी, रसगुल्ला, काजू कतली समेत हर तरह की मिठाइयों के साथ नमकीन और सब्जियां बनाने में भी माहिर हैं। छोटे आयोजनों से लेकर शादी-विवाह, राजनीतिक कार्यक्रमों और बड़े भंडारों तक, हर जगह इनके हाथों के बने पकवानों की मांग रहती है। अब तो चौपाल पर भी हलवाइगिरी के कार्य की चर्चा रहने लगी है।
पहले जहां हलवाई केवल खाना बनाने तक सीमित रहते थे, वहीं अब वे पूरी कैटरिंग व्यवस्था संभालने लगे हैं। दस लोगों से लेकर ढाई लाख लोगों तक का भोजन तैयार करने में दक्ष ये कारीगर अब “प्रतिप्लेट” के हिसाब से ऑर्डर लेने लगे हैं। पकवानों की संख्या के आधार पर दर तय की जाती है, जिससे उनका काम अधिक व्यवस्थित और आधुनिक हो गया है। हालांकि गांव में चिकित्सा, शिक्षा सहित अनेक विभागों में अनेक अधिकारी व कर्मचारी भी कार्यरत हैं। निजी कम्पनियों में भी बड़े पदों पर यहां के युवा कार्यरत हैं।
गांव के अनुभवी हलवाई जगदीश शर्मा बताते हैं कि आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वे किशोरावस्था में जयपुर के हल्दियों के रास्ते में जाकर एक मिठाई की दुकान पर सहायक बने। वहीं से उन्होंने यह हुनर सीखा और बाद में आंधी गांव में खुद का काम शुरू किया। उन्होंने बताया कि त्रिवेणी धाम में आयोजित एक विशाल भंडारे में उन्होंने और उनके साथियों ने करीब ढाई लाख लोगों के लिए प्रसाद तैयार किया, जो उनके जीवन का सबसे बड़ा आयोजन रहा। आज उनके सिखाए हुए करीब 80 हलवाई बिहारीपुरा सहित अनेक गांवों में खुद का रोजगार कर रहे हैं।
हलवाई राधेश्याम शर्मा के अनुसार गांव में करीब 100 हलवाई सक्रिय हैं, जो दिल्ली, मुंबई, जयपुर, कोलकाता, बद्रीनाथ, रामेश्वरम जैसे स्थानों तक काम कर चुके हैं। इतना ही नहीं,यहां के हलवाई नेपाल में भी ये भंडारे करवा चुके हैं। कम लागत में स्वादिष्ट भोजन तैयार करने की कला के कारण इनकी मांग लगातार बनी रहती है।
गांव के ए श्रेणी के हलवाई सालाना 15 से बीस लाख रुपए तक की बचत कर लेते हैं। यही कारण है कि यह पेशा आज भी युवाओं को आकर्षित कर रहा है। गांव में रमेश, चिरंजी, पूरण कुम्हार, मुकेश कुम्हार, राधेश्याम, कैलाश मावावाला, रामस्वरूप, गजानंद, श्रवण, सीताराम, अशोक , देवनारायण और गोपाल जैसे कई अनुभवी हलवाई अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। अब तो पड़ौसी गांव ढाय व झेरा में भी अनेक हलवाई अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं।
Published on:
17 Apr 2026 11:16 pm
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