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अनूठी परंपरा : गोवर्धन पूजा पर 150 योद्धाओं ने लड़ा पाषाण युद्ध, एक-दूसरे पर बरसाए पत्थर

गोवर्धन पूजा पर अल्मोड़ा के विजयपुर पाटिया गांव में ढोल नगाड़ों और शंखनाद के बीच बग्वाल (पाषाण युद्ध ) की परंपरा निभाई गई। करीब 45 मिनट तक रौंगटे खड़ी करने वाली बग्वाल चलती रही। शंखनाद होते ही बग्वाल थम गई।

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गोवर्धन पूजा पर अल्मोड़ा के विजयपुर पाटिया गांव में पाषाण युद्ध की परंपरा निभाई गई

हवालबाग और ताकुला ब्लॉकों की सीमा पर स्थित विजयपुर पाटिया गांव में गोवर्धन पूजा पर सदियों से बग्वाल खेलने की परंपरा चलती आई है। मंगलवार को चार गांवों की एकता की प्रतीक अनूठी बग्वाल खेली गई। इस बार दोनों तरफ से 45 मिनट तक पत्थर बरसाए गए। हालांकि युद्ध में कोई भी बग्वाली वीर घायल नहीं हुआ। बग्वाल में 150 से अधिक वीर शामिल हुए।

पत्थरों की बारिश के बीच ये रोमांच
परंपरा के अनुसार पत्थरों की बारिश के बीच पंचघटिया नदी में पहुंचकर सबसे पहले पानी पीने वाले को विजेता घोषित किया जाता है। इस बार की बग्वाल में दोनों तरफ से हो रही पत्थरों की बारिश के बीच कसून-कोट्यूड़ा गांव के विक्की बिष्ट ने पंचघटिया नदी में पहुंचकर सबसे पहले पानी पिया। उनके पानी पीते ही शंखनाद हुआ और बग्वाल थम गई।

पाषाण युद्ध में ये रहे शामिल
गोवर्धन पूजा पर हुए पाषाण युद्ध में पाटिया, भटगांव के बग्वाली योद्धा पंचघटिया नदी के एक तरफ जबकि कसून और कोट्यूड़ा गांव के वीर दूसरी तरफ से मोर्चा संभाले हुए थे। तय लग्नानुसार बग्वाल शुरू हुई। देखते ही देखते भगवान के जयकारों के बीच दोनों तरफ से पत्थरों की बारिश शुरू हो गई थी।


पानी पीने से रोकने के लिए चलते हैं पत्थर
परंपरा के अनुसार नदी का पानी पीते ही संबंधित योद्धा को विजेता घोषित कर दिया जाता है। इसी के चलते दोनों पक्षों के लोग एक दूसरे को नदी में जाने से रोकने के लिए पत्थरों की बारिश करते हैं। पाषाण युद्ध के बीच खुद को बचाते हुए सबसे पहले नदी में पहुंचकर पानी पीने वाले को विजेता घोषित करने की सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन यहां किया जाता है।

12वीं सदी से चली आ रही परंपरा
मंगलवार को गोवर्धन पूजन के बाद उसी मैदान पर कत्यूरी वंशज एकत्र हुए जहां 12वीं सदी में भीषण पाषाण युद्ध हुआ था। बुजुर्ग हेम पांडे के मुताबिक 12वीं सदी में महालक्ष्मी पूजन के दूसरे दिन सुबह कत्यूरी गोवर्धन पूजा पर गोवंश की पूजा के लिये एकत्र हुए थे। उसी दौरान दुश्मन सेना ने स्यूनराकोट किले की ओर से पाटिया रियासत पर आक्रमण कर दिया था। तब पढियार रियासत के वीर पढियार, कोट्यूड़ा, कसून व कत्यूरियों के पुरोहित भट्ट वीरों ने दुश्मन सैनिकों को पत्थरों से मार-मार कर खदेड़ते हुए गौवंश की रक्षा की थी। उस युद्ध में तब चार से पांच लोगों की मौत हुई थी। उसके बाद से बग्वाल परंपरा चली आ रही है।