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400 सौ करोड़ का काबुल हाउस 40 साल बाद होगा मुक्त, शाही परिवार से जुड़ी है शत्रु संपत्ति

उत्तराखंड के देहरादून में 400 करोड़ की शत्रु संपत्ति काबुल हाउस आखिरकार 40 साल बाद भू माफिया के चंगुल से मुक्त होने होने को है। बकायदा डीएम कोर्ट ने इसके आदेश भी जारी कर दिए हैं।

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देहरादून सिटी

दरअसल, 1937-38 में बंदोबस्त के समय शहरी क्षेत्रों में एक ही खसरा नंबर राजस्व रिकार्ड में अंकित किया जाता था। उस दौर के शहरी क्षेत्र में अलग-अलग खेवट तय होने के बाद भी संबंधित खेवट का खसरा नंबर स्पष्ट नहीं हो पाता था। देहरादून में बंदोबस्ती की कानूनी प्रक्रिया न होने के कारण 1947 में देश के बंटवारे के बाद राजस्व रिकॉर्ड में शत्रु संपत्ति दर्ज नहीं हो पाई थी।

डीएम कोर्ट का बड़ा फैसला
दून में बंदोबस्ती की प्रक्रिया न हो पाने के कारण उस दौर में इस प्रकार की संपत्तियां अभिलेखों में मुस्लिम समाज की भूमि के रूप में दर्ज की गईं थी। डीएम की कोर्ट ने अभिलेखों के परीक्षण में पाया कि काबुल हाउस शत्रु संपत्ति से संबंधति है। कोर्ट ने काबुल हाउस की संपत्ति से मो. साहिल खालिद की विरासत खारिज कर दी है।


1984 में राजस्व आयुक्त ने जारी किया था आदेश
दून की काबुल हाउस शत्रु संपत्ति का मामला पहली बार यूपी के समय में सामने आया था। इस पर 14 अगस्त 1984 को तत्कालीन राजस्व आयुक्त राणा प्रताप सिंह ने डीएम को आदेश दिया था कि काबुल हाउस की संपत्ति को अवैध कब्जेदारों से मुक्त कराएं। तब तहसीलदार ने कब्जेदारों को नोटिस जारी कर संपत्ति खाली करने के निर्देश दिए थे।

40 साल बाद हुई जिला प्रशासन की जीत
काबुल के शाही परिवार से जुड़े काबुल हाउस की करीब 400 करोड़ रुपये की संपत्ति पर अब जिला प्रशासन कब्जा लेगा। डीएम सोनिका की कोर्ट ने काबुल हाउस के भवनों पर अवैध रूप से कब्जा जमाए 17 लोगों के दावों को खारिज कर दिया है।

फोर्स की मौजूदगी में खाली कराया जाएगा काबुल हाउस
डीएम ने काबुल हाउस की शत्रु संपत्ति को खाली करने के लिए सभी कब्जेदारों को 15 दिन का समय दिया है। तय समय पर शत्रु संपत्ति खाली नहीं करने पर पुलिस बल की मदद से इसे अतिक्रमण मुक्त किया जाएगा।

दो उच्च न्यायालयों में भी चला मामला
वर्ष 1984 में कब्जेदारों ने राजस्व आयुक्त के आदेश को छिपाकर सिर्फ तहसीलदार के नोटिस के आधार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की शरण ली थी। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद मामला नैनीताल हाईकोर्ट को ट्रांसफर हो गया था।


प्रशासन का रवैया रहा अटपटा
साल 2007 में मामला डीएम के रिमांड में आ चुका था। उसके बाद भी किसी अधिकारी ने आगे की कार्यवाही शुरू नहीं की। प्रशासन के मौन रहने के कारण ही ये मामला इतने सालों तक अधर में लटका रहा।

फर्जी वारिस भी आए सामने
सरकार में निहित हो चुकी काबुल के राजशाही परिवार से जुड़ी संपत्ति के कई फर्जी वारिस भी सामने आते रहे। उन फर्जी वारिसों ने इस एतिहासिक संपत्ति को कई लोगों को बेच डाला था। इस पर 2021 में उच्च न्यायालय ने जिला प्रशासन को आदेश दिए कि इस प्रकरण का सख्ती के साथ शीघ्र निस्तारण करें तब जाकर अफसर सक्रिय हुए।