1 फ़रवरी 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

आर्डर पर घर-घर जलेबी, समोसा और कचोड़ी पहुंचाने की तैयारी

धौलपुर. शहर के हलवाइयों ने प्रतिदिन सुबह जलेबी-समोसे का नाश्ता करने वाले अपने ग्राहकों की हसरतों का ख्याल रखते हुए अपनी दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लिए भी आय का जरिया निकाल लिया है। लॉक डाउन के बाद शहर में हलवाई आदि की दुकानें बंद होने से जहां अनेक कारीगर बेरोजगार हो गए थे,

3 min read
Google source verification
Preparing to deliver Jalebi, Samosa and Kachori from door to door

आर्डर पर घर-घर जलेबी, समोसा और कचोड़ी पहुंचाने की तैयारी

आर्डर पर घर-घर जलेबी, समोसा और कचोड़ी पहुंचाने की तैयारी
-अब फोन के जरिए से बुक करा सकें गे आमजन

धौलपुर. शहर के हलवाइयों ने प्रतिदिन सुबह जलेबी-समोसे का नाश्ता करने वाले अपने ग्राहकों की हसरतों का ख्याल रखते हुए अपनी दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लिए भी आय का जरिया निकाल लिया है। लॉक डाउन के बाद शहर में हलवाई आदि की दुकानें बंद होने से जहां अनेक कारीगर बेरोजगार हो गए थे, वहीं सुबह नाश्ते में प्रसिद्ध कचोड़ी, जलेबी-समोसे जैसे क्षेत्रीय व्यंजन लेने वाले मायूस हो गए थे। इन हालातों को भांपते हुए इन व्यंजनों को बनाने वाले कारीगरों ने होम डिलीवरी की तैयारी कर ली है। अधिकांश ने अपने ही घरों पर खाद्य सामग्री व वारदाना एकत्र कर सुबह से ही इनका निर्माण शुरू कर दिया। इन लोगों ने अपने नियमित ग्राहकों को फोन पर अथवा उनके घर पहुंच कर उनके पसंदीदा व्यंजन उपलब्ध कराने की जानकारी दी। इसके अलावा इन कारीगरों ने शहर की विभिन्न कॉलोनियों व मोहल्लों में साइकिल अथवा सिर पर रख कर फेरी लगाकर भी जलेबी-समोसों की बिक्री भी शुरू कर दी। इस दौरान इन्होंने अपनी दरों में भी कोई बदलाव नहीं किया।
ग्राहक जता रहे इच्छा
समोसा कारीगर जेल रोड स्थित नयापुरा निवासी रवि ने बताया कि वह लॉक डाउन से पहले शहर में एक हलवाई की दुकान पर काम करता था। लेकिन इसके बाद दुकान बंद होने पर वह बेरोजगार हो गया, तो उसके सामने आर्थिक तंगी आने लगी। इससे परेशान हो उसने अपने नियमित ग्राहकों से फोन पर बात की तो उन्होंने समोसे खाने की इच्छा जताई। इस पर उसने घर में उपलब्ध गैस चूल्हे व कढ़ाई सहित अन्य बरतनों का उपयोग कर समोसा बनाकर अपने ग्राहकों को उनके घर पर ही पहुंचाना शुरू कर दिया। उसने बताया कि वह अब प्रतिदिन घर पर समोसे बनाकर जहां अपने नियमित ग्राहकों का उनके घर देकर आता है, वहीं कुछ माल और आस-पास के मोहल्लों में फेरी लगाकर बेच लेता है। इससे वह प्रतिदिन करीब दो सौ से ढाई सौ रुपए कमा लेता है। लॉक डाउन के इस दौर में भी वह इतनी आय से प्रसन्न है।
आर्डर मिलते हुए गर्म-गर्म पहुंचा रहे
कायस्थपड़ा मोहल्ला में पुलिया के पास रहने वाले किताब सिंह हलवाई की कहानी भी कुछ इसी प्रकार की है। वे भी लॉक डाउन के बाद से प्रतिदिन अपने घर पर ही उपलब्ध संसाधनों से करीब 4 किलो मैदा के फैन की जलेबियां बनाकर अपने ग्राहकों को उपलब्ध करा रहे हैं। उन्होंने बताया कि वे तैयार होने पर ग्राहकों को फोन कर देते हैं और उनके आने पर गर्म-गर्म जलेबियां पैक कर दे देते हैं। इसके अलावा कई ग्राहकों को उनकी मांग पर वे स्वयं ही ग्राहकों के घर पहुंचा आते हैं। उन्होंने बताया कि इससे जहां उनके ग्राहक टूटने का खतरा नहीं हैं, वहीं उन्हें भी रोजगार मिला हुआ है। दर भी उन्होंने पूर्व की ही भांति बाजार भाव के मुताबिक ही तय की हुई है।

व्यंजनों की फेरी ने ताजा की पुरानी यादें
इन व्यंजनों की फेरी लगाने वालों को घर के बाहर से आवाज लगाते हुए गुजरता देख कई बुजुर्गों की यादें भी ताजा हो आई हैं। 1970 के दशक में खान-पान की केवल कुछ ही दुकानें थीं, जो पुराने शहर, बजरिया, हलवाई खाना, लाल बाजार में ही थी। लेकिन इनमें से कुछ पर ही यह व्यंजन मिलते थे। बाजार की अधिकांश दुकानों पर दूध, बेसन, मैदा आदि से निर्मित रबड़ी, बेसन व मगद के लड्डू सहित अन्य व्यंजन अधिक मिलते थे। उस काल में रामेश्वर सेठ, गोविन्दा, तोता पचोरी, कल्ला आदि इस प्रकार के व्यंजनों के प्रसिद्ध कारीगर हुआ करते थे। इनके अलावा गडरपुरा के राजाराम बघेला, गोविन्दा पंडित, पुराना शहर के भवानी आदि लोग भी पूरे धौलपुर नगर में ढकेलों पर कचोरी, समोसे, दाल व बेसन की पकोड़ी, दही बड़ा, गुजिया आदि आवाज लगाकर फेरी बेचते थे। बुजुर्गों ने बताया कि इन लोगों के आने का समय निर्धारित था, जिसके लिए पहले से ही तैयार बैठे रहते थे।

Story Loader