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आधुनिकता ने दिया गोदना को टैटू का नाम, आज भी गोदना को सुहाग का सौभाग्यसूचक चिन्ह मानती हैं आदिवासी महिलाएं

locationडिंडोरीPublished: Dec 09, 2023 02:13:50 pm

Submitted by:

shubham singh

अभी भी विशेष पिछड़ी जनजाति में जीवंत है गोदना परंपरा

Modernity gave the name of tattoo to tattoo, even today tribal women consider tattoo as a lucky sign of marriage.,Modernity gave the name of tattoo to tattoo, even today tribal women consider tattoo as a lucky sign of marriage.
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डिंडौरी. जिले की प्रसिद्ध आदिवासी संस्कृति जिसमें मुख्य रूप से विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा गोंड प्रधान अगरिया एवं बादी जाति की संस्कृति गोदना का चलन अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में देखने मिल रहा है। पुराने गोदना को अब लोगो ने नया रूप देना शुरू का दिया है। आधुनिक तकनीक से लोगो ने इसे टैटू का नाम दे दिया है, जो कभी प्रचीन काल से गोदना के नाम से जाना जाता रहा है। इसे लेकर मान्यता है कि यह शरीर के अलंकरण के साथ-साथ सौभाग्य ***** सुहाग चिन्ह माना जाता है। गोदना को महिलाएं चिरस्थाई आभूषण मानती हैं, उनका कहना है कि सोना चांदी आदि धातुओं के आभूषण तो मृत्यु होने पर छूट जाते हैं किंतु गोदना आभूषण साथ-साथ जाता है, अर्थात परलोक तक जाता है। इसे शारीरिक सजावट का अमिट रेखांकन माना जाता है। इसके अलावा आदिवासियों का शैला, रीना, कर्मा, ददरिया, दादर आदि मुख्य लोकगीत एवं लोक नृत्य भी बहुचर्चित हैं। अगरिया जातियां पहाड़ों जंगलों में स्थित पत्थरों को घर ले जाकर अपनी विशिष्ट भट्टी में डालकर लोहा निकालते हैं। बादी जातियों की महिलाएं सितंबर माह में लगभग 4 महीने के लिए परिवार सहित बैगा एवं गोंडों के गांव में जाकर गुदना का काम करती थी। अब इस परंपरा को मानने वालों की संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही है। गोदना गोदवाने वाले बैग परिवारों के पास इतना पैसा नहीं है कि वह गोदना गोदवाने की कीमत दे सकें, जिस कारण यह परंपरा समाप्त होने की कगार पर है।
अनुसूवित जनजाति में शामिल नहीं हैं बादी
धनेश परस्ते बताते हैं कि संविधान में देश के अंदर स्थित विभिन्न जनजातियों की सूची में यह विशुद्ध आदिवासी जाति नहीं है। आदिवासी को मिलने वाली सुविधाओं से यह जाति वंचित है। जिम्मेदारों को चाहिए की बादी जाति को अनुसूचित जनजाति में शामिल करते हुए इसका लाभ सभी बादी जाति को मिले। जो लोग भी बादी लिखते हैं उन्हें बच्चों से लेकर बड़ों तक को कोई लाभ नहीं मिल रहा है। इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
जीवन यापन के लिए करती हैं यह कार्य
लालपुर निवासी मंगली बाई मरावी का कहना है कि गोदना गोदने का काम अपने जीवन यापन के संसाधन के लिए कुछ लोगो द्वारा किया जा रहा है। यह काम उनके कई पीढिय़ों से चला आ रहा है। प्रशासन की सख्ती के बाद अब यह प्रचलन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। पुरानी परंपरा को मानने वाले ही इस बात को समझते हैं, इसलिए धीरे धीरे गोदना गोदाने वालों की संख्या अब कम होती जा रही है।
इनका कहना है
गोदना प्रथा को लेकर जागरुकता शिविर लगाए जा रहे हैं। जिला प्रशासन इसे बंद करने हर सम्भव प्रयास कर रही है। इसी के तहत शनिवार को मेंहदवानी के पिंडोखी ग्राम मे जागरूकता कैम्प लगाया जा रहा है।
विकास मिश्रा, कलेक्टर डिंडौरी

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