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अस्तित्व और अस्मिता बचाने ग्रामीणों ने शुरू किया सहावभात

दो किलोमीटर वीरान इलाके को फिर से हरा भरा करने का सामूहिक प्रयास

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Rescue and survival of villagers started by the villagers

Rescue and survival of villagers started by the villagers

डिंडोरी। सिलपिडी गांव के ग्रामीणों ने विश्व आदिवासी दिवस पर सहावभात का आयोजन कर इलाके को फिर हरा भरा करने का प्रयास शुरू कर दिया है। ग्रामीणों ने यहां पर एक साथ एकत्र होकर लगभग 1500 पौधों को रोपित करने से पूर्व विधि विधान से प्रकृति देव का आवाहन किया और पूरी श्रद्धा के साथ इलाके में इसका रोपण किया गया। प्रकृति पुत्र बैगा ने अपने अस्तित्व पर संकट उत्पन्न होते देख विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर खुद को बचाये रखने के लिये अपनी भावी पीढ़ी को सुरक्षित रखने के लिये इलाके में कंद और जड़ी बूटियों को उत्पादित करने का अनूठा अभियान शुरू किया है। समाजसेवी नरेश विश्वास के निर्देशन में ग्रामीणों में जंगल को फिर से आबाद करने की ललक जगी और सहावभात का आयोजन कर ग्रामीणों ने दो किलोमीटर के जंगल में कंद और जड़ी बूटियों के पौधों का रोपण किया। सबसे अच्छी बात यह है कि ग्रामीणों ने यहां पौध रोपण के लिए किसी की मदद नहीं ली, बल्कि खुद हफ्तों बैगा चक के जंगलों में घूम-घूम पौधों को एकत्र किया और सहावभात के दिन इलाके में इन्हें रोपित किया। ग्रामीणों के अनुसार उनके भविष्य पर संकट उत्पन्न हो गया है। आने वाली पीढ़ी कंदों व जड़ी बूटियों के बारे में नहीं जान पायेंगी। लिहाजा उन्होंने कंद के रोपण का निर्णय लिया। बताया गया है कि सहावभात बहुत ही पुरातन परंपरा है। जिसे कई इलाकों में बेगार भी कहा जाता है। जिसमें गांव के सभी लोग मिलकर ग्रामीण के खेत में काम करते हैं उसका घर बनाते हैं सामूहिक रूप से सहयोग की इस परंपरा को सहावभात कहा जाता है सहावभात में किसी तरह का शुल्क नहीं दिया जाता है। बल्कि जिसके यहां ग्रामीण काम करते हैं। उसके द्वारा एक समय का भोजन लोगों को करा दिया जाता है। चूंकि यहां पर सहावभात ग्रामीणों के लिये ही किया जा रहा था इसलिये भोजन कराने के लिये किसी एक पर जिम्मेदारी नहीं थी ग्रामीणों ने खुद ही अपने भोजन की व्यवस्था की। बताया गया है कि यहां पर रोपित किये जाने वाले पौधों में कंद और जड़ी बूटियों को इसलिए चुना गया क्योंकि कंद की जड़ें दूर तक फैलती हैं और लंबे समय तक नमी को बरकरार रखती है। साथ ही जड़ी बूटियों का रोपण इसलिए किया ताकि आने वाली पीढ़ी अपने इस पारंपरिक ज्ञान से युक्त रहे। कंद से लगातार नमी बने रहने से एक साल बाद यहां पर किसी भी तरह के पौधे रोपित किये जा सकते हैं। कंद से ग्रामीणों की पोषण और खाद्य सुनिश्चितता हो सकेगी। कंद से मिलने वाली जडें़ पोषण से भरपूर होती हैं। साथ ही इनकी पत्तियां भाजियों के रूप में उपयोग की जाती हैं। बैगा जनजाति के पास मिलने वाले कंद और पत्तियां उनके पोषण का मुख्य आधार मानी जाती रही हैं। अच्छी बात यह है कि ग्रामीणों ने यह पौधे कहीं से नहीं खरीदे बल्कि आसपास के जंगल में मेहनत कर इन्हें एकत्र किया है और सहावभात के रूप में पूरे इलाके में इसका रोपण कर रहे हैं। बिना किसी स्वार्थ के एक दूसरे की मदद को सहावभात कहते हैं। निश्चित तौर पर सहावभात जैसी परंपराएं आज के कथित विकसित समाज में देखने को नहीं मिलती है। आज भी आदिम जनजातियों की परंपरायें और मान्यतायें हमें बहुत कुछ सीखने का अवसर प्रदान करती हैं। प्रकृति के साथ किस तरह आपसी सामंजस्य बनाया जा सकता है यह सीखने के लिये इस विषेष पिछडी जनजाति के लोगों से बढिया और कोई नहीं हो सकता है।
इलाके में कूप निकासी के बाद से यह वीरान हो गया था, हमें कांदा और जड़ी बूटियां नहीं मिल पाती थी, इसलिए हमने सहावभात का आयोजन किया, हम आदिवासी दिवस का मतलब नहीं जानते हैं, लेकिन यदि हम खुद की भावी पीढ़ी को बचाने का प्रयास कर रहे हैं, तो आदिवासी दिवस से अच्छा दिन कोई नहीं हो सकता है।
सुखराम, ग्रामीण सिलपिडी
हमारा जीवन कुछ दिनों का है इलाके में कंद और जड़ी बूटियां पूरी तरह नष्ट हो गई। हम अपने बच्चों को क्या देकर जा रहे हैं। इसलिए हमने इनका रोपण किया। साथ ही हम मजदूर बनने की कगार पर आ गये हैं जबकि जंगल हरा भरा रहेगा, तो हमें किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं है जंगल ही हमको पाल लेता है।
बुधवा बैगा, ग्रामीण
बैगाओं की अस्मिता और अस्तित्व बचाने के लिये सहावभात का आयोजन किया गया है। जिसमें लगभग पांच गांवों के ग्रामीणों ने भाग लिया। आसपास के इलाके से कंद और जड़ी बूटी लाकर इसका रोपण किया। इनकी सुरक्षा का संकल्प लिया। भले ही इन्हें आदिवासी दिवस का मतलब नहीं पता हो, लेकिन आदिवासी दिवस को वास्तविक रूप में सार्थक करने का काम ग्रामीणों ने किया है।
नरेश विश्वास, समाजसेवी व प्रेरक