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जड़ी-बूटियों से असाध्य रोगों का इलाज करने आदिवासियों ने बताए उपाय

locationडिंडोरीPublished: Feb 05, 2024 10:56:59 pm

Submitted by:

shubham singh

आयुर्वेदिक औषधियों के संरक्षक व संवाहक वैद्यों की कार्यशाला

Tribal people suggested ways to treat incurable diseases with herbs.
Tribal people suggested ways to treat incurable diseases with herbs.

डिंडौरी. जनपद पंचायत बजाग के ग्राम चांडा में ’’वैद्य शास्त्र’’ बैगा क्षेत्रों में आयुर्वेदिक औषधियों के संरक्षक व संवाहक वैद्यों की कार्यशाला आयोजित की गई। मुख्य अतिथि कु. लक्ष्मी गढवाल को कलेक्टर रूपी बनाया गया जिन्होंने कार्यक्रम के शुभारंभ पर सरस्वती मां के छायाचित्र में दीप प्रज्जवलित एवं माल्यापर्ण कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। जिसमें आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के बैगा जनजाति के पंरपरागत चिकित्सक मौजूद रहे। अपनी आर्युवेदिक परंपरा को संरक्षित करने के उद्देश्य से आज जिला प्रशासन के द्वारा विषेष पहल कर जिला आयुष विभाग की सहयोग से जिले में निवासरत ग्रामीण अंचलों के परंपरागत आर्युवेदिक डॉक्टरों की कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें चिकित्सकों के साथ साथ उनके परिवार के सदस्यों के साथ साझा किया। कलेक्टर विकास मिश्रा ने वैद्य कार्यक्रम के दौरान बताया कि ग्राम पंचायत चांडा बैगाचक के केन्द्र बिन्दु चांडा विकासखंड बजाग में आज बैगा क्षेत्रों में आयुर्वेदिक औषधियों के संरक्षक व संवाहक वैद्यों की कार्यशाला आयोजित की गई। जिसमें 40 परंपरागत आयुर्वेदिक डॉक्टर शामिल हुए। जिन्होंने एक-एक करके अपनी जडी बूटियां एव उनसे होने वाले उपचार से बीमारियों की जानकारी दी। बैगा जनजातियों के जडी बूटियां एवं इलाज डॉक्टर संरक्षित कर आने वाले इनका लाभ मिल सके इसी के तहत यह कार्यशाला आयोजित की गई।
असाध्य से असाध्य रोगों का भी उपचार
मप्र और छत्तीसगढ़ में निवास करने वाले बैगा जनजाति के आदिवासी अपनी भाषा, रीति रिवाज, धार्मिक विश्वास विचार एवं परंपराओं से बंधी है। मनोरंजन के लिये इनके अपने संगीत, लोक नृत्य, लोक नाट्य, लोक गीत प्रहसन पौराणिक एवं दंत कथायें है। अपनी जीवनोपयोगी के लिये ये वनवासी अधिकतर वन्य प्राणी एवं वनस्पति पर निर्भर रहते हैं। चाहे उनका भोजन हो, तन ढकने के वस्त्र, घर बनाने की सामग्री हो अथवा खेती करने के औजार। यहा तक की रोगों को दूर करने के लिये इनकी अपनी ही चिकित्सा प्रणाली होती है। जिनमें मुख्यत: तंत्र मंत्र, जड़ी बूटी से लेकर जांगम दन तक का उपयोग करते हैं। जिसके कारण ये लोग असाध्य से असाध्य रोगों का भी उपचार कर लेते हैं। जंगलों से प्राप्त इन जड़ी बूटियों की इन वनवासियों को अच्छी पहचान रहती है। प्रदेश में जहां कई जनजातियां विकास की ओर अग्रसर है, वहीं बैगा जनजाति आज भी अपने परम्परागत रीति रिवाजों और धार्मिक संस्कारों के साथ विकास की दौड़ में प्रयासरत हैं। बैगा स्वयं को जंगल का राजा कहते हैं।
इन जड़ी बूटियों का किया जाता है प्रयोग
डिंडौरी के बैगा आदिवासी मुख्यत: निम्न जड़ी बूटियों का उपयोग करते हैं। जो इनके जंगलों में बहुतायत से प्राप्त हो जाती है। जिनमें मुख्यत: वन अदरक, बांस की पिहरी, कियो कंद, तेलिया कंद, वन प्याज, वंश लोचन, सरई की पीहरी, काली हल्दी, (कुरकूमा सीजिया) वन सिंघाड़ा, ब्रम्हरकास, तीखुर, बैचांदी, बिदारी कंद, बन सूरन, माई बेला की जड़, अंडी की जड़, चिटकी की जड़, बेर की जड़, हर्रा, बहेरा, आंवला, बन अंडी, मैनहर, भकरैंडा, भैंस बच, पारस पीपर, लजनी, छोटी दूधिया, नागरमोठा, जरीया, रुहीना, पथरचटा, हड़ जुड़ी, महुआ, काली धान, खांडा घार, चिरायता, सफेद मूसली, लडैया का पत्ता, गुड़मार, बैंच भाजी, चकाँडा भाजी, पकरी भाजी, हड़सिंघड़ी, ब्राम्ही, जोगी लटी, बनछुरिया की बेल, भूतन बेल, सरई छाल, कूढ़ा छाल, साहू छाल, मैदा छाल, अर्जुन छाल, विघा नाशी, सिरमिली, हत्था जोड़ी, उल ठली, कुब्बी, हिरन चरी, गंवार पाठा, पाताल कुम्हड़ा, जटा शंकरी, वन तुलसी, भोज राज, तेंदू, धननियां, बड़ी सतावर, नागदाना, करई, हुलहुलिया, छिंदी, धनवंतरी, भिलवा, लक्ष्मण कंद, पोटीया कंद, केसरी कंद, हुरुम कंद, भैंसा ताड़, किटी मार कंद, बांदी सांड़, बड़ी ऐंठी, छोटी ऐंठी, बहला ककोरा, आमी हल्दी, कुरकुट के पत्ते आदी जड़ी बूटियों का उपयोग जीवन भर चलता रहता है।
इनकी रही मौजूदगी
मैडल साल, कम्बल से कार्यशाला में शामिल समस्त आर्युवेदिक परंपरागत ग्रामीण चिकित्सकों को मैडल पहनाकर सम्मानित किया गया। और सभी वैद्यों को सामूहिक भोजन कराया गया। कार्यक्रम के अतिथि डॉ. विजय चौरसिया, संतोष परस्ते जिला आयुष अधिकारी, ब्रजभान गौतम बीआरसी, तीरथ परस्ते प्राचार्य चांडा, आर के जाटव एसडीओ वनविभाग, डॉ. मेथानिया व आयुष विभाग के समस्त स्टॉफ सहित जिले के अन्य विभाग के अधिकारी एवं कर्मचारी मौजूद रहे।

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