
500 में से किसी एक को हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी के एक पीढ़ी से दूसरी में जाने की आशंका 50 फीसदी होती है।
अब परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाले आनुवांशिक रोगों से गर्भस्थ शिशु को बचाया जा सकेगा। इसके अलावा उन भू्रण को भी बचाना आसान होगा जो जेनेटिक कारणों से गर्भ में पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाते। ऐसा खास तकनीक (सीआरआईएसपीआर-सीएएस9) से संभव हो सकेगा। इसकी मदद से गर्भ में पल रहे भू्रण के जीन में प्रभावित हिस्से को हटाकर भविष्य में होने वाले आनुवांशिक रोगों की आशंका को कम कर सकेंगे। खासतौर पर हृदय संबंधी रोगों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।
इस तरह उपयोगी है तकनीक -
विशेषज्ञ के अनुसार जीनोम स्वस्थ शिशु तैयार करता है। जीन एडिटिंग समझने के लिए पुरुष के स्पर्म से 58 भू्रण तैयार किए जिसमें हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी रोग पनप रहा था। फिर स्वस्थ महिला के गर्भाशय से अंडे निकालकर भू्रण तैयार किया। तकनीक के सहारे भू्रण के जीन के प्रभावित भाग को काटकर अलग किया। ऐसा डीएनए पर टारगेट करने वाले एंजाइम सीएस-9 से संभव हुआ। डीएनए के किसी भाग के प्रभावित होने पर यह एंजाइम उसे काटकर अलग कर देता है। सबकुछ सही होने पर डीएनए खुद को दोबारा रिपेयर कर लेता है।
हृदय रोगों से बचाव -
वैज्ञानिकों ने तकनीक का प्रयोग कर गर्भस्थ शिशु को आनुवांशिक रोग हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी से बचाने में सफलता हासिल की। इस रोग में हृदय की मांसपेशियां मोटी होने के कारण हार्ट अटैक की आशंका रहती है। करीब 500 में से एक को होने वाले इस रोग के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाने की आशंका करीब 50 फीसदी होती है।
डॉक्टरी राय -
जीन एडिटिंग की शानदार कामयाबी के बाद सभी के साथ विचार-विमर्श होगा। इसके बाद इसपर क्लीनिकल ट्रायल किया जाएगा। हम खुद को और बेहतर करना चाहते हैं जिससे भविष्य में इस तकनीक को और आधुनिक तरीके से इस्तेमाल में ले सकें।
इस खोज से हजारों जिंदगियां बच सकेंगी। हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी जीन में डिफेक्ट के कारण होती है। भारत में एक हजार में से दो बच्चे इस रोग से पीडि़त होते हैं। पीडि़त व्यक्ति की मौत 20-50 वर्ष की उम्र में हो जाती है। इस आनुवांशिक रोग का कोई इलाज नहीं। पूरी दुनिया में आने वाला समय जीन थैरेपी का होगा। इसे बढ़ावा मिलना चाहिए।
Published on:
25 Aug 2019 06:21 pm

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