
गुरु पूर्णिमा पर विशेष : गुरु ही होता है शिष्य का वास्तविक अभिभावक
फैजाबाद (अयोध्या ) श्रीराम जन्मभूमि न्यास अध्यक्ष मणिराम दास छावनी महंत नृत्य गोपाल दास महाराज ने गुरू पूर्णिमा के महत्व को समझाते हुये कहा शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक, गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का अपने ज्ञानांजन द्वारा बड़े ही सरलतापूर्वक निवारण कर देता है.अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है . उन्हो ने कहा गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक"अज्ञान तिमिरांधश्च ज्ञानांजन शलाकया,चक्षुन्मीलितम तस्मै श्री गुरुवै नमः " में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी ,बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है. गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है. उन्हो ने कहा आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं. इस दिन गुरु पूजा का विधान है गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है, इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं, ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं, न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी, इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं, जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है .
संत कबीर कहते हैं कि,गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोक्ष,गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मैटैं न दोष .मनु महाराज ने गुरु को ही वास्तविक अभिभावक बताया है
उन्हो ने कहा साधना के क्षेत्र में गुरु को भगवान से भी ऊंचा दर्जा दिया गया है, क्योंकि उनके अनुग्रह के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं होता. जीवन रहस्यों का उद्घाटन केवल गुरु ही करने में सक्षम होते हैं. जिस प्रकार नेत्रहीन व्यक्ति को संसार का अनुपम सौन्दर्य दिखाई नहीं दे सकता, उसी प्रकार जब तक गुरु हमें प्रकाश नहीं देगा, उसका मार्गदर्शन हमें नहीं मिलेगा, तब तक आंखें रहते हुए भी हमें चारों ओर अंधकार ही नजर आएगा. हम सही रास्ते पर नहीं चल सकेंगे. गुरु की महिमा के बारे में संत कबीर कहते हैं कि,गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोक्ष,गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मैटैं न दोष .मनु महाराज ने गुरु को ही वास्तविक अभिभावक बताया है. उनके हिसाब से विद्या माता के रूप में शिष्य को जन्म देती और बड़ा करती है. गुरु उस विद्या से आगे शिष्य को जीने लायक और जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त करने लायक सामर्थ्य प्रदान करता है. लौकिक माता-पिता तो बच्चे को जन्म देकर उसका पालन-पोषण ही करते हैं, जबकि उसके विकास में सहायता करने वाला, उसे सन्मार्ग पर चलाने वाला गुरु ही होता है. वही मनुष्य का कल्याण कर उसके लिए मुक्ति का द्वार खोलता है. मनु ने तो विद्या को माता तथा गुरु को पिता बताया है.
Published on:
26 Jul 2018 10:52 am
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