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Govardhan puja 2017 : गोवर्धन पूजा के साथ ही अन्नकूट महोत्सव का भी है विशेष महत्त्व

Govardhan puja 2017 : गोवर्धन पूजा हिन्दू परिवार अपने घर पर दिवाली के दूसरे दिन करते हैं। इसके लिए सुबह गोबर लेकर आते हैं और उससे बच्चे की आकृति

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Deovrat Singh

Oct 19, 2017

govardhan puja 2017

govardhan puja 2017

Govardhan puja 2017 : गोवर्धन पूजा हिन्दू परिवार अपने घर पर दिवाली के दूसरे दिन करते हैं। इसके लिए सुबह गोबर लेकर आते हैं और उससे बच्चे की आकृति के पास पर्वत भी बनाते हैं। इस आकृति को किसी बड़े बर्तन से या अन्य से ढक देते हैं। पूजा का समय सूर्यास्त के बाद होता है। इसके लिए पूरी पूजा की विधि काम में ली जाती है। गोवर्धन की आकृति के पास दीपक भी जलाया जाता है। गांवों में और शहरों के अलावा सब जगह पर पूजन की अलग अलग मान्यताएं है। जैसे कुछ जगह गाय के बछड़े का पैर लगवाकर पूजा की जाती है। और चूरमा खिलाया जाता है। घर के बड़े सदस्य के द्वारा पूजा की जाती है।

इस दिन मंदिरों में अन्नकूट महोत्सव मनाया जाता है। अन्नकूट का महत्त्व इसलिए है की नए अनाज की शुरुआत भगवान के भोग लगाकर की जाती है। घर-घर में जहां महिलाएं गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाकर पूजा-अर्चना करती है। वहीं मंदिरों में भगवान को छप्पन भोग अर्पित करके बाजरे और अनाज से अन्नकूट का प्रसाद वितरित किया जाता है । अन्नकूट में बाजरे, मोठ और नए अनाज को शामिल किया जाता है। साथ ही सर्दी की शुरुआत होने के संकेत मिलते हैं और मूली की शब्जी भी बनाई जाती है।
पुरानी मान्यता है की मूली का भगवान के भोग लगने के बाद ही खाने के काम में लिया जाता है।

govardhan puja shubh muhurt :

सुबह का मुहूर्त- सुबह 06:28 बजे से 08:43 बजे तक
शाम का मुहूर्त - 03:27 बजे से सायं 05:42 बजे तक

राजस्थान में अन्नकूट महोत्सव सभी मंदिरों में मनाया जाता है। इसदिन मंदिर में श्रद्धालु अपनी श्रद्धा अनुसार चढ़ावा चढ़ाते हैं लेकिन परिवार के अनुसार सभी घरों से मंदिर में अनाज और मूली पहुंचाई जाती हैं। जिन घरों में पशुपालन होता है उस दिन दूध से बानी छाछ मंदिर में पहुंचाई जाती है। दोपहर में भगवान के भोग लगने के बाद से ही भक्तों में प्रसादी बांटना शुरू कर दिया जाता है।

सांयकाल में फिर गोवर्धन पूजा की जाती है। गोवर्धन पूजा के बाद उस गोबर को अपने खेत में या ऐसी जगह पर थपड़ी बनाकर रखा जाता है जो अधिक से अधिक दिन तक रहे तो कृपा दृष्टि बनी रहती है। खेती या पूजनीय पेड़ की जड़ों में भी अर्पित करके पानी से सिंचित कर सकते हैं।