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Cashless India: नोटों को छापने में हो गए आठ हजार करोड़ से ज्‍यादा खर्च, फिर भी एटीएम खाली

आरबीआई से जारी आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2016 से जून 2017 के बीच नए नोटों के निर्माण में 7,965 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।

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Cashless india

Cashless India

नई दिल्‍ली। देश में नोटबंदी के बाद 2000 हजार रुपए, उसके बाद 500 रुपए और 200 रुपए के नोटों के अलावा 50 रुपए के नए नोटों की छपाई की गई थी। इन नोटों की छपाई में कई हजार करोड़ रुपए खर्च किए गए। उसके बाद भी आज फिर देश उसी दौर में पहुंच गया है जहां एक दो साल पहले था। वो दौर था नोटबंदी का। देश में सभी एटीएम खाली पड़े हुए हैं। हर कोई परेशान है। देश की जनता केंद्र सरकार की ओर ताक रही है कि आखिर बैंकों से उनका रुपया कहां गायब हो गया। ना तो उन्‍हें बैंकों में जाकर कैश मिल रहा है ना ही एटीएम में। आइए आपको भी इस रिपोर्ट में बताते हैं कि नोटबंदी के बाद नोटों की छपाई में कितना रुपया खर्च किया गया।

8 हजार करोड़ रुपए किए जा चुके हैं खर्च
आरबीआई ने 18 दिसम्बर 2017 को लोकसभा में नोट छपाई में होने वाले खर्च की जानकारी दी थी। इस जानकारी में जो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए थे वो देश के लोगों को आज फिर से चौंका सकते हैं। अगर आपको इस बात की जानकारी दी जाए कि नोटबंदी के बाद नोटों की छपाई में करीब 8 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं और कई लाख करोड़ रुपए की राशि मार्केट में लाई जा चुकी है तो आपके पैरों से जमीन खिसक जाएगी। ताज्‍जुब की बात तो ये है कि उसके बाद भी देश में कैश किल्‍लत है। इस किल्‍लत से देश के लोग परेशान हैं।

नोटबंदी से पहले का खर्च
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने जो अपनी रिपोर्ट पेश की थी उसमें नोटबंदी से पहले के आंकडों पर नजर दौड़ाएं तो जुलाई 2015 से जून 2016 के बीच देश में करेंसी की छपाई में 3,420 करोड़ रुपए खर्च किए थे। उस समय देश में 500 और 1000 रुपए के पुराने नोट प्रचलन में थे और तेजी से उनका विस्‍तार भी हो रहा था। इस बात की किसी को यहीं नहीं था कि अचानक से इन दोनों नोटों को भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था से बाहर कर दिया जाएगा।

नोटबंदी के बाद खर्च
अब बात करते हैं नोटबंदी के बाद के करेंसी को बनाने के खर्च के बारे में। आरबीआई से जारी आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2016 से जून 2017 के बीच नए नोटों के निर्माण में 7,965 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। यानि पिछले साल के मुकाबले दोगुना से भी अधिक। रिपोर्ट की मानें तो 2017 में नोट छपाई पर होने वाले खर्च में 133 फीसदी की वृद्धि हुई थी।

फिर भी देश में कैश की समस्‍या
आरबीआई की इस रिपोर्ट में कोई भी नहीं झुठला सकता है। खुद केंद्र सरकार भी इस रिपोर्ट में मानती है। अब सवाल ये है कि आखिर इतना रुपया नोटों के निर्माण में खर्च करने के बाद भी देश से करेंसी कहां गायब हो गई। इस बात का जवाब सरकार के पास नहीं है। देश की सरकार जनता को सिर्फ दिलासा देने के अलावा दूसरा कोई काम नहीं कर रही है। अब देखने वाली बात होगी कि क्‍या केंद्र सरकार देश की जनता को तीन दिनों में कैश की व्‍यवस्‍था कर पाएगी या नहीं।