
गाडरवारा के इतिहास को भी लिपिबद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है
गाडरवारा। नगर के स्वर्णिम इतिहास में डमरूघाटी ने नए आयाम दिए हैं। डमरूघाटी इस क्षेत्र में तीर्थ स्थल बन चुकी हैÓउक्ताशय के विचार वरिष्ठ साहित्यकार कुशलेन्द्र श्रीवास्तव ने विगत दिनों डमरूघाटी का इतिहास पुस्तक विमोचन के अवसर पर व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हर एक इतिहास को लिपिबद्ध होना चाहिए। गाडरवारा के इतिहास को भी लिपिबद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके पूर्व मंचासीन अतिथि नगरपालिका की पूर्व अध्यक्ष अनीता जायसवाल, डमरूघाटी समिति के पदाधिकारी संदीप पलोड़, सुरेश राठी, श्याम राठी, गोपाल मालपानी, बसंत डागा, डीके उपाध्याय, केदार अग्रवाल, डॉ सुभाष चन्द्रा, रिंकी चन्द्रा, किताब के लेखक डीसी राय, शिवशंकर ढिमोले ने भगवान शंकर के चित्र पर माल्यापर्ण कर पूजा अर्चना की। मंचासीन अतिथियों का स्वागत श्रीफल भेंट कर किया गया। डीसी राय ने कहा कि उन्होंने अभी जो डमरूघाटी का इतिहास लिखा है, वह केवल एक भाग है। इसमें अभी बहुत कुछ जोड़ा जाना शेष है। सुभाष चंद्रा ने कहा कि भगवान शिव की महिमा और उनके चमत्कार को उन्होंने आत्मसात किया है। इस पवित्र धरा पर स्थापित इस अभूतपूर्व शिवधाम का मात्र दर्शन कर लेना ही पर्याप्त है। बसंत डागा, सचिव संदीप पलोड़, डीके उपाध्याय ने भी डमरूघाटी पर प्रकाश डाला। पूर्व नपाध्यक्ष अनीता जायसवाल ने कार्यक्रम की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस स्थल के विकास में सभी का महत्वपूर्ण योगदान है, जिसे रेखांकित किया जाना चाहिए। कार्यक्रम का संचालन एवं आभार पं. बालाराम शास्त्री ने किया।
Published on:
24 Feb 2020 04:47 pm
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