
रोजा हमें बुराइयां छोड़ नेक इंसान बनने का संदेश देता
रमजान के महीने में ही अल्लाह ने कुरान को आसमान से नीचे उतारा जिसमें जीवन जीने के तरीके बताए गए हैं।
रोजे की शुरुआत 2 हिजरी से हुई थी। हजरत मोहम्मद जब मक्का छोड़कर मदीना पहुंचे उसके एक साल बाद मुसलमानों को रोजा रखने का हुकुम आया। कुरान की दूसरी आयत सूरह अल बकरा में रोजा को लेकर अल्लाह का हुक्म आया कि रोजा तुम पर उसी तरह फर्ज किया गया है। जैसे तुम से पहले लोगों पर फर्ज किया गया था।
रोजा रखने का मकसद स्वयं के अंदर झांकने का मौका होता है। वह अपनी बुराइयों को दूर करता है। और एक नेक इंसान बनने के लिए इबादत करता है। नेक बंदों पर ही खुदा की रहमत और बरकत होती है।
ईद हमें गिले-शिकवे भूलकर आपस में भाईचारा का संदेश देता
मुसलमानों की एक महीना रोजा रखने के बाद ईद उल फितर का त्यौहार आता है। जिसकी खुशी में सभी लोग एक दूसरे को मिठाईयां या सेवई खिलाते हैं। ईद उल फितर इस्लामी कैलेंडर के दसवें महीने सव्वाल के पहले दिन मनाया जाता है। इस्लामी कैलेंडर के सभी महीनों की तरह यह भी नए चांद के देखने पर शुरू होता है। मुसलमानों का त्योहार ईद मूल रूप से भाईचारे को बढ़ावा देने वाला त्यौहार है। यह त्यौहार गिले-शिकवे भूलकर आपस में भाईचारा का संदेश देता है।
ईद के दिन फितरा देने का विशेष महत्व, यदि ऐसा नहीं हुआ तो सारी इबादत बेकार हो जाती
ईद के दिन सुबह जल्दी उठ कर नहा धोकर नए कपड़े लोग पहनते हैं। मुस्लिम समुदाय के हर व्यक्ति के लिए रमजान में ईद की नमाज से पहले फितरा देना यानी अपने माल दौलत में से कुछ हिस्सा गरीबों में बांटना जरूरी होता है। यदि यह हिस्सा वह गरीबों में नहीं बांटता है। तो रमजान मे की गई उसकी सारी इबादत जमीन और आसमान के बीच में लटका दी जाती है।
माना जाता है कि सबसे पहले ईद सन 624 ईसवी में पैगंबर हजरत मोहम्मद ने मनाई थी। इस ईद को ईद उल फितर के नाम से जाना गया। पैगंबर हजरत मोहम्मद ने ईद बद्र के युद्ध में विजय हासिल करने की खुशी में मनाई थी।
ईद शब्द का उपयोग अरबी फारसी और उर्दू तीनों भाषाओं में होता है। ईद का अर्थ हिंदी में पर्व या त्यौहार के होते हैं। ईद शब्द का अर्थ खुशियां हर्षोल्लास के लिए उपयोग किया जाता है।
Published on:
03 May 2022 10:48 am

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