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हाईकोर्ट का भी आदेश बेअसर! अवैध कमाई के चक्कर में मजदूरों की नियुक्ति नहीं कर रहा FCI

न्यायालय ने चार साल भारतीय खाद्य निगम में श्रमिकों की तैनाती के आदेश दिए थे, श्रमिक संगठन ने राष्ट्रपित से लगाई गुहार

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Food Corporation of India Gonda

कैलाशनाथ वर्मा
गोण्डा. भारतीय खाद्य निगम में नियम कानून व उच्चाधिकारियों का आदेश कोई मायने नहीं रखता है, बल्कि यहां पर तैनात जिम्मेदारों की मर्जी चलती है। ऐसा लगता कि जिम्मेदारों ने मनमानी करने की ठान ली है।

प्रकरण भारतीय खाद्य निगम में मजदूरों की नियुक्ति से जुड़ा है। यहां पर हाईकोर्ट के निर्देश के क्रम में सहायक महाप्रबन्धक ने क्षेत्रीय प्रबन्धक को कोर्ट में संलग्न श्रमिकों की सूची के अनुसार तत्काल समायोजन की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिये गये थे, लेकिन अब भी जिम्मेदार प्रक्रिया शुरू करने के बजाय श्रमिकों को टरका रहे हैं।

बताते चलें कि भारतीय खाद्य निगम में भारत सरकार ने ठेकेदारी को समाप्त कर बकायदा 23 अप्रैल 2010 को नोटिफिकेशन जारी कर खाद्य निगम को निर्देशित किया था कि कर्मचारियों की नियमित नियुक्ति कर कार्य लिया जाये, जिसके अनुपालन में प्रबन्ध निदेशक भारतीय खाद्य निगम ने सरकुलर 1991 के अन्तर्गत मजदूरों की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिये थे।

इस आदेश के क्रम में क्षेत्रीय महाप्रबन्धक लखनऊ ने 23 दिसम्बर 2010 को आदेश पारित कर मजदूरों के वरिष्ठता क्रम को दस वर्ष के स्थान पर तीन वर्ष कर दिया गया, जिससे पुराने पात्र श्रमिकों को नियमितीकरण का लाभ न मिल पाने के कारण पुराने श्रमिकों ने उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की। याचिका कर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि भारतीय खाद्य निगम के अधिकारियों ने मामले को उलझाने के लिए वरिष्ठता क्रम को 10 के बजाय तीन कर दिया। जब कोर्ट द्वारा खाद्य निगम को अपना पक्ष रखने के लिए निर्देशित किया गया तो कोर्ट को दिये गये काउन्टर एफिडेबिट में निगम द्वारा अभी तक किसी की ज्वॉइनिंग न कराने का हलफनामा देते हुए कहा गया कि पूर्व की तरह बाराबंकी के श्रमिकों से कार्य लिया जा रहा है।

मामले में न्यायालय ने प्रबन्ध निदेशक को प्रकरण का अवलोकन कर पुराने श्रमिकों को तैनाती देने का आदेश दिया। न्यायालय के आदेश चार वर्ष बीत जाने के बाद भी जब भारतीय खाद्य निगम में श्रमिकों की तैनाती नहीं हो सकी है। अब श्रमिक यूनियन ने राष्ट्रपति व राज्यपाल को पत्र देकर कोर्ट का आदेश अनुपालन कराये जाने की गुहार लगाई। इसके बाद क्षेत्रीय महाप्रबन्धक ने क्षेत्रीय प्रबन्धक को सूची के आधार पर श्रमिकों की तैनाती करने का निर्देश दिया, लेकिन अभी तक श्रमिकों के तैनाती की प्रक्रिया शुरू न होने से विवश श्रमिकों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर अब कौन सुनेगा इनकी बात।

तो इसलिए नहीं हो रही तैनाती
भारतीय खाद्य निगम में श्रमिकों की तैनाती महज इसलिए नहीं की जा रही है कि तैनाती हो जाने के बाद अधिकारियों के जेब खाली हो जायेंगे। सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि यहां कोर्ट को भले ही हलफनामा देकर एक भी श्रमिक की तैनाती न करने की बात कही गयी हो लेकिन यहां पर 222 श्रमिकों का वेतन आहरण किया जा रहा है। एक श्रमिक के नाम पर 14 हजार का भुगतान लिया जाता है और दिहाड़ी के मजदूरों को महज 5 से 6 हजार देकर कार्य लिया जाता है। जिससे विभाग के जिम्मेदारों को तैनाती कर देने के बाद यह खेल समाप्त हो जाने का अंदेशा है जिससे वे टाल मटोल कर रहे हैं।

कहते हैं क्षेत्रीय प्रबन्धक
इस सम्बन्ध में क्षेत्रीय प्रबन्धक एच.पी. सिंह ने बताया कि नियुक्ति के सम्बन्ध में न तो कोर्ट से अथवा मेरे विभाग द्वारा कोई आदेश हुआ है। उन्होंने श्रमिक यूनियन के नेताओं पर फर्जीवाड़ा करने का आरोप लगाते हुए आदेश को भी फर्जी करार दिया। कहा कि इसी के नाम पर यूनियन के नेता धन उगाही कर रहे हैं। मुझे नियुक्ति के सम्बन्ध में कोई आदेश नहीं मिला है।

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