
गोण्डा. परसपुर ब्लॉक क्षेत्र का पसका सूकर खेत सरयू संगम एक पौराणिक व ऐतिहासिक स्थल है। यहाँ पौष माह के प्रारम्भ होते ही साधु संत गृहस्थ सरयू संगम त्रिमुहानी तट पर कल्पवास की परम्परा है। पूरे पौष माह होने वाला पसका सूकरखेत स्थित संगम तट का कल्पवास सोमवार 2 दिसम्बर से शुरू हो गया है। दूरदराज के साधु-संत गृहस्थों ने पसका के सरयू-घाघरा संगम तट त्रिमुहानी घाट पर फूस की झोपड़ी बनाकर कल्पवास शुरू कर दिया हैं, जो जनवरी पौष पूर्णिमा को मुख्य स्नान करेंगे। धार्मिक एवं ऐतिहासिक दृष्टिकोण से पसका सूकरखेत का जिले में महत्वपूर्ण स्थान है। गोण्डा का गौरव, धार्मिक व ऐतिहासिक पौराणिकता को सँजोये पसका पर्व उत्तर भारत का अद्वितीय मेला है। शास्त्र पुराण व गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरित मानस सूकरखेत के पौराणिक धार्मिक महत्व का उल्लेख है। ये 2 जनवरी तक चलेगा।
सूकरखेत का पौराणिक महत्व
हिरण्याकश्यप का भाई हिरण्याक्ष महादैत्य ने पृथ्वी को चुराकर पाताल लोक में अपने चारों तरफ मैला एकत्र कर उसी में छिप गया, जिससे देवताओं में हाहाकार मच गया। दैत्य के चंगुल से पृथ्वी को छुड़ाने के लिए सुर नर मुनि सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गये। देवताओं की करुण पुकार से द्रवित होकर भगवान विष्णु ने वाराह (सूअर) के रूप में अवतरित हुये और पृथ्वी को लेकर मैले के बीच पाताल में छिपे राक्षस हिरण्याक्ष का वध किया। इसके बाद पृथ्वी को महादैत्य के चंगुल से छुड़ाया। बताया जा रहा है कि भगवान विष्णु के वाराह अवतार गाथा से पसका सूकरखेत को वाराह अवतार स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यहां पसका सूकरखेत स्थित वाराह छत्र के प्राचीनतम मन्दिर में वाराह भगवान विराजमान हैं, जो श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है।
सूकरखेत का धार्मिक महत्व :
गोण्डा जनपद के परसपुर ब्लॉक के पसका सूकरखेत स्थित सरयू और घाघरा नदियों का संगम हुआ है। यहाँ पसका सूकरखेत में पश्चिम से पूरब दिशा की ओर प्रवाहित हो रही घाघरा नदी की धारा सरयू नदी में समाहित हुई। दो नदियों के संगम के चलते ही यहां कल्पवास का पौरणिक महत्व है, जिससे यह स्थान त्रिमुहानी तट कहा जाता है। यहां पौष पूर्णिमा को विशाल मेला लगता है। इसे संगम मेला कहा जाता है। संगम मेला के इस पौष पूर्णिमा को लाखों श्रद्धालु स्नान करते हैं।
पसका सूकरखेत का ऐतिहासिक महत्व
परसपुर क्षेत्र के पसका सूकरखेत में गोस्वामी तुलसीदास के गुरु नरहरि दास का आश्रम है। यहां गुरु आश्रम से चार किमी दूरी राजापुर गांव में गोस्वामी तुलसीदास का जन्म हुआ। मां-बाप की बचपन में ही मृत्यु हो जाने से वह इधर-उधर भटकते हुए नरहरि के आश्रम पहुंचे। जहां गुरु नरहरि ने उनका पालन -पोषण सहित रामकथा सुनाई, जिसे सुनकर गोस्वामी जी ने रामचरित मानस की रचना की। गोस्वामी तुलसीदास ने इस स्थान का उल्लेख करते हुए श्री रामचरित मानस के बालकांड में लिखा है कि- 'मैं पुनि निज गुरु सन सुनी कथा सो सूकरखेत" अर्थात मैंने अपने गुरु नरहरि दास से रामकथा सूकरखेत में सुनी।
पौष पूर्णिमा संगम स्नान तक सरयू तीरे कल्पवासियों ने कहा
सूकरखेत के त्रिमुहानी तट पर कल्पवास करने आये बलरामपुर जिला से बाबा दयानंद दास ने कहा कि वह पौष मास की शुरुआत से ही यहां कल्पवास के लिये अनवरत 18 वर्षो से आते हैं। बहराइच जिला से यहां कल्पवास करने आई राधा का कहना है कि उन्हें यहां कल्पवास में आनंद अनुभूति होती है। जम्मू कश्मीर से आये बाबा भोजपत्र गिरी संगम तट पर फूस की झोपड़ी डालकर कई वर्षों से रहकर कल्पवास कर रहे हैं। परसपुर क्षेत्र के सकरौर के बाबा राघवराम दास व सूर्यपाल दास ने कहा कि वह कई वर्षों से यहां कल्पवास करने आ रहे हैं।
Published on:
26 Dec 2017 07:09 pm
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