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घंटों कोंडर झील के तट पर बेगम संग बैठते थे नवाब आसिफुद्दौला, अब है ये हाल

गोंडा जिले के वजीरगंज में स्थित कोंडर झील में अब प्रवासी पंक्षियों का कोलाहल नहीं सुनाई देता

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गोण्डा. 'कल चमन था आज इक सेहरा हुआ' देखते ही देखते ये क्या हुआ। शायर की ये पंक्तियां स्वर्ग कोंडर झील के तट पर स्थित अवध के नवाब आसिफुद्दौला के निर्मित ऐतिहासिक बारादरी के वास्तविक दास्तान को बयां कर रही है, जहां कभी कलकल बहती कोंडर झील पर प्रवासी पंछियों के कोलाहल की गूंज गुंजायमान रहती थी, मगर वक्त क्या बदला यहां की पूरी दास्तान ही बदल गयी। जहां कभी रंग-बिरंगे पंक्षियों का कोलाहल गुंजायमान रहता था, आज वहां दूर दूर तक ख़ामोशी का साया दस्तक दे रहा है।

वजीरगंज कस्बे के पूरब की ओर स्थित कोंडर झील के तट पर स्वर्ग की अनुभूति कराने वाले ऐतिहासिक धरोहरों का निर्माण जमशेदबाग के रूप में अवध के नवाब आसिफुद्दौला ने सन 1775 से 1795 के बीच लखौरी ईंटों के साथ-साथ चूना व सुर्खी के मिश्रण से करवाया था। उन्होंने बारादरी के साथ-साथ उसके अंदर मस्जिद न्यायलय व अनेकों भवन भी बनवाये थे। बताते चलें कि दक्षिण दिशा की ओर प्रवाहित कोंडर झील के निर्मल जल को स्पर्श करती बारादरी की सीढ़ियां उन दिनों किसी स्वर्ग के नजारे से कम न थीं।

झील के तट पर घंटों बैठते थे नवाब और उनकी बेगम
प्रवासी पंक्षियों के कोलाहल से झील हमेशा गुंजायमान रहता था, जिसका सुन्दर नज़ारा लेने के लिए नवाब व उनकी बेगम झील के तट पर घंटों बैठे रहते थे। मगर बदलते वक़्त के साथ साथ यहां की कहानी भी बदलने लगी। नवाब ने अपनी इन इमारतों को अमजद अली शाह को दिया, जिसे अमजद अली शाह ने सन 1837 में अपने वजीर अमीनुद्दौला के प्रिय मुंशी बकर अली खां को सौंप दिया। कहा जाता है कि बारादरी के मध्य एक अपूर्ण भवन है जो अचानक अंग्रेजों के आक्रमण करने से पूरा न हो सका। बताते चलें कि वक़्त के साथ साथ सभी इमारतें जमीदोज हो गयीं। याद के रूप में सिर्फ ऐतिहासिक बारादरी शेष है जो वक्त के थपेड़ों को सहकर जमीदोज के कागार पर पहुंचता जा रहा है। अवगत हो कि यहां विगत कुछ दिनों पहले जब डी.एम व सी.डी.ओ पहुंचे तो वो भी विचित्र नजारे को देख आश्चर्य चकित रह गए और उनका भी मन बाग बाग हो गया।

झील के जल पर कायम है जलकुम्भियों का राज
कोंडर झील के निर्मल जल पर जहां कभी विचरण करने वाले पंक्षियों का कलरव रहता था, आज वहां जलकुम्भियों का राज कायम है। जो झील के मनमोहक दृश्य पर दिखाई दे रहा है। इसके चलते अब यहां मनमोहक पंक्षियों का आगमन समाप्त हो चुका है।

पुरातत्व विभाग भी नहीं दे रहा है ध्यान
बीते दिनो पुरातत्व विभाग ने जमींदोज हो रही इस धरोहर को मरम्मत करवा कर उसका रंग रोगन भी करवाया था, मगर सच तो यह है कि यहां बदरंगी का रंग आज भी हकीकत की दास्तान बयां कर रही है। चारों तरफ गंदगी का अम्बार लगा हुआ है। काश पुरातत्व विभाग इस पर विशेष ध्यान देता तो यहां का नजारा कुछ अलग ही होता।

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