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पूर्वजों की गौरवगाथा भावी पीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत करें : डॉ. बाल मुकुन्द पाण्डेय

उन्होंने कहा कि भारत के गांव-गलियों का वह अतीत जो हमारे पूर्वजों की गौरवगाथा का हिस्सा है उसे भावी पीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत करें।

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बालमुकुंद पांडेय

गोरखपुर. भारतीय इतिहास पराजितों, अपमानितों, गरीबों, भूखमरी का इतिहास लगता है। अब अकादमिक मंचों पर, विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों में पाठ्यक्रम परिवर्तन की हलचल प्रारम्भ हो चुकी है। इस हलचल को सही दिशा देने के लिए विद्वानों को आगे आना होगा। हम भारतीय सीमा पर तोप नहीं चला सकते, देश के लिए कलम तो चलाएं। आजाद भारत के सात दशक पूरा होने के बाद भी हम ब्रिटिश शासकारों, साम्यवादियों एवं समाजवादियों द्वारा लिखित भारत का विकृत इतिहास पढ़ रहें है। इसे बदलने के लिए इतिहास के विद्वानों को आगे आना होगा।

ये बातें अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ. बाल मुकुन्द पाण्डेय ने कही। वह शनिवार को महाराणा प्रताप पीजी कॉलेज जंगल धूसड़ एवं भारतीय इतिहास संकलन समिति गोरक्षप्रान्त द्वारा आयोजित भारतीय इतिहास के पाठ्यक्रमों में विसंगतियां एवं समाधान विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि भारत के गांव-गलियों का वह अतीत जो हमारे पूर्वजों की गौरवगाथा का हिस्सा है उसे भावी पीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत करें जिससे कि वह प्रेरणा ले सकें। हम भारतीय इतिहास लेखन के एक नए युग के निर्माता बनें। देश-समाज के लिए जीने-मरने वाले अपने पूर्वजों का स्मरण हमारा धर्म हैं। गौरवशाली अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान में की गई तपस्या से ही भावी भारत का निर्माण होगा।

अध्यक्षता करते हुए मगध विश्वविद्यालय गया के दक्षिण-पूर्व एशियाई अध्ययन विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. महेश कुमार शरण ने कहा कि भारतीय इतिहास लेखन की विसंगतियों पर बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही प्रश्न खड़े होने लगे थे। काशी प्रसाद जायसवाल, रमेशचन्द्र मजूमदार, आनन्द कुमार स्वामी, बाल गंगाधर तिलक, डॉ. आर भण्डारकर जैसे प्रतिष्ठित इतिहासकारों ने ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा भारतीय इतिहास की विकृतियों पर न केवल प्रश्न खड़ा किया अपितु भारत का वास्तविक इतिहास प्रस्तुत करने का अथक प्रयत्न भी किया। मगर सत्ता संरक्षित इतिहासकारों एवं इतिहास लेखन के प्रभाव को रोका न जा सका।

उद्घाटन समारोह में प्रस्ताविकी रखते हुए प्राचार्य डॉ. प्रदीप राव ने कहा कि युवा इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास लेखन की दिशा बदली है। भारतीय इतिहास लेखन का पुनर्जागरण युग प्रारम्भ हो चुका है। आर्य आक्रमण का सिद्धान्त ध्वस्त हो चुका है। सरस्वती की खोज की जा चुकी है। वेदों के रचयिता ऋषियों की आदिभूमि चिह्नित की जा रही है। स्वर्णिम भारत के इतिहास के नित-नूतन अध्याय खोजे जा रहे हैं। लिखे जा रहे हैं। आवश्यकता है इन नवीन शोधों के आधार पर इतिहास के पाठ्यक्रमों में परिवर्तन की।

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