21 अप्रैल 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Gorakhpur by-election 2018 जानिए कौन हैं डाॅ.संजय निषाद जिन्होंने गोरखपुर की राजनीति में हलचल पैदा कर दी

ढाई साल के सियासी सफर को आखिरकार डाॅ.संजय निषाद ने अंजाम तक पहुंचा दिया ही है

2 min read
Google source verification
sanjay nishad

गोरखपुर। ढाई साल के सियासी सफर को आखिरकार डाॅ.संजय निषाद ने अंजाम तक पहुंचा दिया ही है। गोरखपुर के एक बहुसंख्यक समाज को राजनीतिक रूप से जागरूक कर तीन दशक के अजेय किले को ढहाने में उनके योगदान से इनकार नहीं किया जा सकता। सपा-बसपा के एक साथ आने के अलावा इस जीत में निषाद दल के कार्यकर्ताओं और उससे जुड़े लोगों का भी बड़ा योगदान रहा। क्योंकि निषाद मतों के धु्रवीकरण के बिना बीजेपी की हार संभव ही नहीं थी। यही वजह है कि प्रचार के आखिरी दिनों में बीजेपी ने भी निषाद मतों को अपने पाले में करने के लिए हर वह कोशिश की जो राजनैतिक लाभ के लिए की जा सकती थी।
लेकिन महत्वपूर्ण यह कि निषाद समाज अपने बीच के नेता को चुनना ही बेहतर समझा। जिसका नतीजा यह रहा कि निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डाॅ.संजय निषाद के पुत्र ई.प्रवीण निषाद सपा के सिंबल पर सांसद चुन लिए गए।

कौन हैं डाॅ.संजय निषाद

निषाद समुदाय के नेता बन चुके डाॅ.संजय कुमार निषाद गोरखपुर के कैंपियरगंज क्षेत्र के रहने वाले हैं। जाट आरक्षण आंदोलन की तर्ज पर गोरखपुर में भी निषाद समुदाय से जुड़ी उपजातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के लिए आंदोलन शुरू कर पहली बार 2015 में वह सुर्खियों में आए थे। आरक्षण की मांग को लेकर हजारों निषाद समुदाय के लोगों को लेकर रेलवे ट्रैक को जाम कर आंदोलन चलाया था। पुलिस और लोगों की झड़प में पुलिस की गोली से अखिलेश निषाद नामक युवक की मौत हो गई थी। इस मामले में काफी बवाल मचा था। पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया था। इसमें इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे नेता डाॅ.संजय निषाद भी शामिल रहे। कसरवल कांड से
जाने जाने वाले इस प्रकरण से जेल से छूटने के बाद डाॅ.संजय निषाद
अपने समाज के बड़े नेता होकर उभरे। इसके बाद उन्होंने निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल नाम से पार्टी बनाई। बीते विधानसभा चुनाव में पीस पार्टी के साथ गठबंधन किया। खास बात यह कि इस गठबंधन ने विधानसभा की कई सीटों पर काफी अच्छा प्रदर्शन कर हजारों वोट बटोरे। हालांकि, चुनाव बाद भी उन्होंने अपनी मुहिम धीमी नहीं की। वह लगातार निषादों की विभिन्न उपजातियों की एकता के लिए कार्य करते रहे हैं। ये लोग निषाद वंशीय समुदाय की सभी पर्यायवाची जातियों को एक मानते हुए अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग करते हैं।
इस उपचुनाव के पहले से ही डाॅ. संजय ने अपने दल का प्रत्याशी उतारने का मन बनाया था। लेकिन लखनउ में संयुक्त विपक्ष की हुई बैठक में सपा ने उनको अपने सिंबल पर लड़ने का न्योता दिया। राजनीतिक समीकरणों को समझते हुए उन्होंने अपने बेटे को चुनाव मैदान में उतारने के साथ दल का भी समर्थन सपा को दिया।

बड़ी खबरें

View All

गोरखपुर

उत्तर प्रदेश

ट्रेंडिंग