
गोरखपुर। यूपी का एनआरएचएम घोटाला हजारों करोड़ रुपये की बंदरबांट की कहानी तो है ही आधा दर्जन से अधिक अधिकारियों व इससे जुड़े लोगों की मौत का परवाना भी साबित हुआ। आलम यह कि इस घोटाले से जुडे़ करीब दस लोग मौत की नींद सो चुके हैं। कुछ के आत्महत्या की खबरें आईं तो कुछ के हत्या की। कई मौतें तो हत्या और आत्महत्या के बीच उलझ कर रह गई। गोरखपुर में रह रहे रिटायर्ड पूर्व डायरेक्टर व पूर्व सीएमओ पीके श्रीवास्तव की आत्महत्या के बाद एक बार फिर एनआरएचएम घोटाला सुर्खियों में है।
बुधवार को एनआरएचएम घोटाले में सीबीआई की पूछताछ की लिस्ट में शामिल पूर्व सीएमओ व यूपी स्वास्थ्य सेवाओं के पूर्व डायरेक्टर डाॅ.पीके श्रीवास्तव की आत्महत्या की खबर आई। डाॅ.पीके श्रीवास्तव का भरापूरा परिवार है। 67 साल की उम्र में वह सेवानिवृत्ति में आए दिन सीबीआई की पूछताछ से परेशान बताए जा रहे थे। उनकी बहू एकता श्रीवास्तव ने बताया कि काफी डिप्रेशन में रह रहे थे। बार बार पूछताछ के लिए दिल्ली जाना पड़ रहा था। 15 जनवरी को उनको सीबीआई ने दिल्ली आने का बुलावा तय कर रखा था। लेकिन 10 जनवरी को ही उन्होंने अपने लाइसेंसी पिस्टल से गोली मार आत्महत्या कर ली। डाॅ.श्रीवास्तव अपने पीछे तमाम सवालात छोड़ गए जिसका उत्तर शायद ही मिल सके। लेकिन एनआरएचएम घोटाले का खूनी खेल एक बार फिर जेहन सबके जेहन में ताजा हो गया है।
एनआरएचएम घोटाले से जुड़े इन लोगों की भी जा चुकी है जान
करीब सात साल पहले इस घोटाले के सुर्खियों में आने के बाद एक के बाद एक मौत सबको दहला दिया था। ज्यों-ज्यों जांच और कार्रवाई आगे बढ़ रही थी मौत की खबर भी साथ ला रही थी। इस घोटाले से जुड़ी सबसे पहली मौत की खबर सीएमओ विनोद आर्या की आई थी। डाॅ.विनोद आर्या की उनके आवास के पास ही हत्या कर दी गई थी। बताया जाता है कि डाॅ. आर्या के पास इस घोटाले से जुड़े तमाम रसूखदारों का कच्चाचिट्ठा मिल सकता था। इसी तरह एक दूसरे सीएमओ वीपी सिंह जो इस घोटाले से जुड़े थे उनकी भी हत्या कर दी गई। वह मार्निंग वाक पर निकले थे, घर उनकी लाश आई। दो सीएमओ की हत्याओं ने प्रदेश को हिला कर रख दिया था। अभी यह चल ही रहा था कि गाजियाबाद के डासना जेल में एनआरएचएम घोटाला के एक आरोपी की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई। आशुतोष अस्ााना की मौत के बाद इस घोटाले से जुडे़ यूपीपीसीएल के प्रोजेक्ट मैनेजर सुनील वर्मा की भी खुद को गोलीमार आत्महत्या की खबरें आईं। वह भी अपने साथ तमाम राज अपने साथ लेकर दुनिया छोड़ गए थे।
इसके पहले डिप्टी सीएमओ वाईएस सचान की मौत की भी खबरें आई थी। डाॅ.सचान ने आत्महत्या की या उनकी हत्या हुई थी यह तक किसी को पता नहीं चल सका। इसी घोटाले के एक और आरोपी डिप्टी सीएमओ शैलेश यादव, लिपिक महेंद्र शर्मा की भी जान रहस्यमय परिस्थितियों में जा चुकी है।
क्या है एनआरएचएम घोटाला
ग्रामीण भारत को सेहतमंद रखने और स्वास्थ्य व्यवस्था मुहैया कराने के लिए एनआरएचएम नामक योजना की शुरूआत की गई थी। इसके तहत हजारों करोड़ रुपये स्वास्थ्य योजनाओं के लिए प्रदेशों को भेजे जाते थे। करीब सात साल पहले कैग ने अपनी रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश में एनआरएचएम में धांधली की बात कही थी। कैग के अनुसार अप्रैल 2005 से लेकर मार्च 2011 तक यूपी को एनआरएचएम के तहत 8657.35 करोड़ रुपये मिले। इनमिले धन में करीब पांच हजार करोड़ को नियमों की अनदेखी कर खर्च किया गया। रिपोर्ट के अनुसार ग्यारह सौ करोड़ रुपये तो बिना किसी के हस्ताक्षर के भुगतान कर दिया गया था। कई सौ करोड़ रुपये चहेते ठेकेदारों को बिना किसी एग्रीमेंट भुगतान कर दिया गया। दो दर्जन जिलों में सीएजी रिपोर्ट के आधार पर भारी अनियमितता की बात सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार सरकारी दवा खरीदी दस गुना से बीस गुना अधिक रेट पर किया गया। जननी सुरक्षा के नाम पर मिलने वाली धनराशि का दिल खोलकर बंदरबांट किया गया। उपकरणों की खरीद में कई सौ गुना का खेल हुआ। हजारों करोड़ का खर्च दिखा दिया गया लेकिन उसका लेखाजोखा किसी भी जिले में मौजूद नहीं मिला। अस्पताल निर्माण के नाम पर कई हजार करोड़ डकार लिए गए।
Updated on:
11 Jan 2018 12:51 pm
Published on:
11 Jan 2018 12:44 pm
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