
मंत्री सिसौदिया का दावा : बमौरी में कराए दो साल में 17 हजार करोड़ रुपए के विकास कार्य
गुना. जिले में गुना सहित राघौगढ़, चांचौड़ा के अलावा बमोरी को मिलाकर कुल चार विधानसभा हैं। इनमें बमोरी एक ऐसी विधानसभा है, जिस पर जिले के जनप्रतिधियों के अलावा प्रदेश सरकार का विशेष फोकस है। क्योंकि यह क्षेत्र सहरिया, आदिवासियों का मुख्य वैल्ट है। सरकार और नेता यहां के नागरिकों को सरकारी योजना का लाभ दिलाकर चुनाव के समय अपने पक्ष में ज्यादा से ज्यादा मतदान कराना चाहते हैं। वर्तमान में इस विधानसभा से महेंद्र सिंह सिसौदिया विधायक भी हैं और प्रदेश सरकार में पंचायत मंत्री भी। वे इस विधानसभा में अब तक 17 हजार करोड रुपए का भारी भरकम बजट खर्च कर संपूर्ण विकास करने का दावा सार्वजनिक मंच से करते हैं। जबकि पूरे विभाग का बजट 27 हजार करोड़ है। आधे से अधिक बजट प्रदेश की केवल एक यानि अपनी विधानसभा में विकास कार्य पर खर्च कर चुके हैं, इस सबके बाद भी वहां की जनता मूलभूत सुविधाओं के लिए परेशान है। उधर मंत्री के दावे की जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। यहां रहने वाले सहरिया, आदिवासी सरकारी जनहितैषी योजनाओं के लाभ से वंचित बने हुए हैं। उनके पास न तो स्थानीय स्तर पर रोजगार है और न ही रहने को पक्का मकान। गांव में 24 घंटे तो क्या 6 घंटे भी नियमित रूप से लाइट नहीं मिल रही। सड़क और पेयजल की स्थिति तो बेहद ही गंभीर है। सहरिया, आदिवासी बाहुल्य ग्रामों में न तो नलजल योजना की व्यवस्था है और न ही सरकारी बोर पानी देने की स्थिति में है। ग्रामीणों को पानी के लिए इधर उधर भटकना पड़ रहा है। सबसे बड़ी मुसीबत तो यह है कि ग्रामीण पहले पीने के पानी की जुगाड़ करें या फिर दो वक्त के भोजन के लिए रोजगार की। गांव के विकट हालातों को देखते हुए अधिकांश ग्रामीण तो रोजगार की तलाश में विधानसभा तो क्या जिले को ही छोड़कर दूसरे प्रदेशों में चले गए हैं।
स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि कोरोना के बाद वे जब गांव लौटे तो उन्हें यही नहीं पता था कि आगे चलकर इतने ज्यादा हालात खराब होंगे कि यहां वे दो जून की रोटी के लिए भी मोहताज हो जाएंगे। आर्थिक परेशानियों के बीच मूलभूत सुविधाओं के अभाव ने उनकी परेशानी और ज्यादा बढ़ा दी हैंं। बच्चे स्कूल जाने की वजाए घर परिवार चलाने रोजगार की तलाश में लगे हुए हैं। भीषण गर्मी ने मजदूरी भी बहुत ज्यादा मुश्किल कर दी है।
एक मात्र ट्यूबवैल, पानी भरना है तो साढ़े तीन घंटा इंतजार करो
बमोरी विधानसभा क्षेत्र के आदिवासी और सहरिया बाहुल्य गांवों में पेयजल संकट के हालात कितने गंभीर हैं। इसका एक उदाहरण है ग्राम कराखेड़ा। जो छिकारी पंचायत अंतर्गत आता है। स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक वर्तमान में पेयजल व्यवस्था की स्थिति बहुत ही खराब है। गांव में एक मात्र सरकार बोर बचा है, उसमें भी इतना कम पानी है कि एक बार यदि पानी भर लिया तो अगले बार पानी भरने के लिए करीब साढ़े 3 घंटे इंतजार करना पड़ेगा। बोर में जब पानी एकत्रित हो जाएगा तब जाकर पानी भर सकेेंगे। यह बोर गांव के विद्युत फीडर पर लगा है। गर्मी बढऩे के साथ ही अन्य हैंडपंप और अन्य सरकारी बोर दम तोड़ चुके हंै। कुछ निजी बोर हैं जो काफी गहराई तक खुदे हैं। इसलिए अभी तक थोड़ा बहुत पानी दे रहे हैं, उन्हीं से ग्रामीण काम चला रहे हैं। लेकिन पेयजल स्त्रोत कम होने तथा ग्रामीणों की संख्या अधिक होने से पानी भरने में बहुत ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसी तरह बेरखेड़ी, बरसाती गांव में पेयजल समस्या है वहां के लोगों को पानी के लिए काफी दूर जाना पड़ता है। जहां पानी के लिए महिलाओं के बीच झगड़ा होते देखा जा सकता है।
इन ग्रामों में पेयजल के हालात चिंताजनक
बमोरी जनपद में 79 ग्राम पंचायत आती हैं। इनमें अधिकांश पंचायतों में सहरिया आदिवासी बाहुल्य र्ग्राम हैं। जिनमें सरकार की योजना के तहत नलजल योजना का होना जरूरी है। लेकिन कई गांवों में योजना के होने के बावजूद ग्रामीणों को पेयजल मुहैया नहीं हो पा रहा है। कहीं लाइट की समस्या है तो कहीं पानी कम होने की वजह से योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है। इनमें प्रमुख रूप से भगवानपुरा, भिंडरा, रंगपुरा, रवडी, पनेटी, छतरपुर, उचकपूरिया, रामपुरिया, मिरवाडा, चकपरसी खेड़ा, अमरोद, चिम रामपुर, बमोरी पठार, आत्रसुना, जौहरी, बर्दा, पराट, ग्वारखेड़ा, रामनगर, पांचोरा, आटा खेड़ी अकोदा, बेरखेड़ी गांव हैं।
बमौरी के 350 हैण्डपम्प शोपीस
जिला प्रशासन के अनुसार सबसे अधिक पेयजल संकट बमौरी विधानसभा क्षेत्र में हैं, बमौरी विधानसभा क्षेत्र अकेले में ही साढ़े तीन सौ हैण्डपम्पों ने दम तोड़ दिया है। वैसे जिले में 542 हैण्डपम्प बंद हो चुके हैं। हैण्डपम्प बंद होने की वजह से लोग खेतों पर 1100 सिंगलफेस मोटर से पानी भरते नजर आते हैं।जिसमें केवल बमौरी में ही 800 अकेली हैं। वहीं झागर सहित 50 गांवों के लोग काफी दूर से पानी लाकर अपनी प्यास बुझाते हैं।बमौरी में जल स्तर की बात करें तो 250 से लेकर 320 फीट तक नीचे चला गया है।
फतेहगढ़ मार्ग की हालत खस्ता
गुना से फतेहगढ़ जाने वाले मार्ग को पत्रिका टीम ने देखा तो कई पुलिया ऐसी मिलीं जिनका रास्ता भी कच्चा था और उन पर रेलिंग तक नहीं लगी दिखाई दी। इसके साथ ही पुलिया क्षतिग्रस्त दिखी, जिनसे कभी भी हादसा हो सकता है। इसके अलावा कई मार्गों पर गड्डे भी दिखाई दिए।
सिंचाई
बमौरी विधानसभा क्षेत्र में ग्वाल टोरिया और पनहेटी तालाब की मांग लंबे समय से चल रही है। इसी बीच भैंसा टोरी तालाब की नहर कई जगह से क्षतिग्रस्त हो चुकी है। इस नहर के क्षतिग्रस्त होने से बमौरी, करमदी, अकोदा, बडऩपुर,करमदी,,मणिखेेड़ा, साजरवाले टपरे, ग्वारखेड़ा, खैरोदा मंदिर, हिनोतिया, खड़ेला जैसे कई गांवों में ङ्क्षसचाई तक के लिए पानी नहीं मिल रहा है।
बिजली
बिजली की हालत बमौरी विधानसभा क्षेत्र में देखा जाए तो कहीं गांवों के लोग बिजली की समस्या से बेहद परेशान हैं। यहां दिन और रात में कई घंटे बिजली समस्या गहराई हुई है। झागर से लेकर फतेहगढ़ तक गांवों के लोगों को सिंचाई आदि के लिए डीपी रखवाई गई थी। इन गांवों का भ्रमण किया तो कई गांव ऐसे मिले जहां डीपी तो दूर बिजली के खंबे तक गायब मिले।गांवों के लोगों ने बताया कि सबसे अधिक समस्या बिजली की है, दिन के साथ-साथ रात भर के लिए बिजली चली जाती है।
जलवायु भी प्रभावित
बमौरी विधानसभा में लगातार जंगल कटने के मामले को लेकर वहां के लोगों ने कहा कि जमीन बनाने के लिए अलग-अलग समाज के लोगों ने अपने आसपास की वन विभाग की भूूमि पर खड़े जंगल साफ कर दिए।आज हजारों बीघा में खड़े पेड़ कट गए। जिनको वन विभाग भी नहीं रोक सका। पेड़-पौधे साफ होने से यहां का जलवायु भी प्रभावित होने लगा। पानी की कमी के साथ-साथ बढ़ता प्रदूषण भी लोगों की परेशानी बना हुआ है।
पीएम हाउस तक नहीं बन पाए
उधर मंत्री के दावों के बीच एक बात यह निकलकर सामने आई कि स्वास्थ्य सेवा पर भी अधिक पैसा खर्च किया है। जब इस संबंध में कई गांवों के ग्रामीणों से पूछा तो उनका कहना था कि गांव में उप स्वास्थ्य केन्द्र तो हैं लेकिन न तो वहां दवाई है और न ही डॉक्टर। चार साल पूर्व बमौरी और म्याना में पीएम हाउस बनने की मंत्री सिसौदिया ने घोषणा की थी, वह भी पूरी नहीं हो पाई है।
्र्रग्रामीणों की परेशानी उनकी जुबानी
गांव में इन दिनों पीने के पानी की समस्या बहुत ज्यादा विकराल होती जा रही है। सरकारी बोर पहले ही दम तोड़ चुके हैंं। न तो हैंडपंप पानी देने लायक बचे हैं ओर न ही ट्यूबवैल। ग्रामीण पूरी तरह से निजी बोरों के भरोसे होकर रह गए हैं। प्रशासन इस ओर गंभीरता से ध्यान नहीं दे रहा है।
प्रेम सिंह, ग्रामीण
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आदिवासी, सहरिया बाहुल्य जिन ग्रामों में सरकारी बोर सूख चुके हैं। भूजल स्तर गिरने से हैंडपंप दम तोड़ चुके हंै। अन्य पेयजल स्त्रोत हैं नहीं या फिर बहुत ज्यादा दूर हैं। ऐसे में प्रशासन को टैंकर के माध्यम से जल परिवहन की व्यवस्था करनी चाहिए।
अभय सिंह भिलाला
Published on:
09 May 2022 01:25 am
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