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सरकारी विभागों में अधिकारी पी रहे आरओ का पानी और स्कूल के बच्चों को शुद्ध पानी तक नसीब नहीं

पत्रिका फोकस :अधिकांश कार्यालयों में ट्यूब वैल लगे होने के वावजूद पानी खरीदने पर खर्च हो रहा लाखों रुपएदानदाता आर्थिक रूप से सम्पन विभाग को दे रहे दान और सरकारी स्कूल के बच्चों को नहीं

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गुना . मूलभूत सुविधाओं में से एक पानी हर व्यक्ति की जरूरत है लेकिन आजादी का अमृत महोत्सव मनाने के बाद भी शुद्ध पानी हर व्यक्ति के लिए उपलब्ध नहीं है। यह हकीकत पत्रिका ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आई है। जिला मुख्यालय पर कलेक्ट्रेट सहित सभी सरकारी विभाागों से लेकर सरकारी स्कूलों में जाकर देखा तो हकीकत कुछ अलग ही नजर आई। जहां अधिकांश विभागीय कार्यालयों में अधिकारियों के लिए बाजार से आरओ का पानी प्रतिदिन आ रहा है। वहीं ऐसे सरकारी स्कूल ज्यादा मिले जहां आरओ, वाटर कूलर तो क्या सामान्य पानी के लिए पेयजल व्यवस्था भी ठीक नहीं है। इस अव्यवस्था के लिए स्कूल प्रबंधन, शिक्षा विभाग सहित स्थानीय प्रशासन व दानदाता भी जिम्मेदार हैं। क्योंकि यह सभी वास्तविक जरूरत को अनदेखा कर रहे हैं। यही कारण है कि स्कूली बच्चों को आज भी घर से पानी की बॉटल लेकर ही आना पड़ रहा है।
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सरकारी विभागों की हकीकत
पेयजल व्यवस्था की जमीनी हकीकत जानने के लिए पत्रिका टीम सबसे पहले कलेक्टे्रट भवन पहुंची। जिसके निर्माण की कुल लागत ही 22 करोड़ से अधिक है। यहां एक नहीं बल्कि दो सरकारी ट्यूबवैल हैं। इसके बावजूद यहां 30 से अधिक विभागों में पदस्थ अधिकारियों के लिए बाजार से आरओ का पानी प्रतिदिन आता है। वहीं यहां आने वाले लोगों के लिए कलेक्ट्रेट में दो वाटर कूलर लगे हुए हैं। जिन पर शासन या अधिकारियों ने पैसा खर्च नहीं किया बल्कि बैंक ने दान स्वरूप दिए हैं।
इसके बाद जिला पंचायत कार्यालय जाकर देखा तो यहां भी बाजार से आरओ के पानी की सप्लाई पाई गई। इसी तरह परिसर में संचालित अन्य सरकारी विभाग कुटीर एवं ग्रामोद्योग, मतस्य, रेशम विभाग, एसडीएम कार्यालय, तहसील कार्यालय, पटवारी कार्यालय, जिला अस्पताल, जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय, डीपीसी कार्यालय में भी यही व्यवस्था मिली। पड़ताल में सामने आया कि पानी के एक कैंपर की कीमत 20 रुपए है। ऐसे में आसानी से समझा जा सकता है कि 50 से अधिक विभागों में कितने अधिकारी-कर्मचारी पदस्थ हैं। जिन्हें आरओ का पानी पिलाने पर हर माह कितना पैसा शासन की मद से खर्च हो रहा है।
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सरकारी स्कूलों की स्थिति
स्टूडेंट की संख्या के आधार पर शहर का दूसरा सबसे बड़ा सरकारी गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल कैंट का है। जहां कक्षा 1 से 12 तक पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 1200 से अधिक है। यहां पेयजल स्त्रोत के लिए ट्यूबवैल तो है। लेकिन शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं। इसी वजह से हजारों स्टूडेंट घर से पानी की बॉटल लेकर आते ही हैं। वहीं स्कूल प्रिंसीपल भी बॉटल घर से ही लाती हैं। जिससे यह स्पष्ट है कि स्कूल का पानी कितना पीने योग्य है। यह अलग बात है कि जब उनसे स्टूडेंट को शुद्ध पानी उपलब्धता के बारे में पूछा तो वे यह कहती हुईं नजर आईं कि जिस टंकी मेंं पानी भरा जाता है उसे समय-समय पर साफ किया जाता है।
इसी तरह कैंट का ही बालक हायर सेकेंडरी स्कूल भी छात्र संख्या के लिहाज से दूसरे नंबर पर ही है। यहां दो वाटर कूलर लगे मिले। लेकिन फिर भी स्टाफ घर से बॉटल लेकर ही आता है। यह स्थिति पानी की शुद्धता पर प्रश्नचिन्ह खड़ी करती है।
शहरी क्षेत्र में स्थित जाटपुरा मिडिल स्कूल, नानाखेेड़ी प्राथमिक विद्यालय, मातापुरा कैंट प्राथमिक विद्यालय में पेयजल के सही इंतजाम नहीं मिले। मातापुरा स्कूल में पेयजल के लिए हैंडपंप तो है लेकिन खराब होने पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है।
कुल मिलालकर ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि पेयजल स्त्रोत उपलब्ध होने के बावजूद अधिकारियों ने कई साल बाद भी ऐसे इंतजाम नहीं किए हैं जिससे कार्य स्थल पर ही शुद्ध पानी नियमित रूप से मिल सके। बड़े अधिकारी तो बाजार से आरओ का पानी मंगवाकर पी रहे हैं। लेकिन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले हजारों बच्चों को शुद्ध पानी मिल सके इस ओर गंभीरता से कोई नहीं सोच रहा।
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ग्रामीण क्षेत्र में योजनाएं सिर्फ कागजों में
जानकारी के मुताबिक जल जीवन मिशन स्कीम के तहत ही सरकारी स्कूलों में पेयजल व्यवस्था के लिए समुचित स्ट्रक्चर तैयार किया जाना था। यही नहीं यदि स्कूल परिसर में पेयजल स्त्रोत मौजूद नहीं है तब भी इलाके की नलजल योजना से इसे जोड़कर बच्चों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना था। लेकिन इस पूरी व्यवस्था को ठेकेदार के भरोसे छोड़ दिया गया। जिसके कारण स्कूल में सिर्फ स्ट्रक्चर बनकर ही रह गए। पेयजल का कोई इंतजाम नहीं हो सका। इस योजना के तहत गुना जिले के ऐसे सरकारी स्कूल चिन्हित गिए थे, जहां पेयजल व्यवस्था टोंटी के माध्यम से नहीं है। योजना के तहत ठेकेदार द्वारा स्कूल परिसर में पेयजल के लिए नया स्ट्रक्चर बनाया गया। पानी के लिए एक टंकी रखकर पाइप लाइन के जरिए नल कनेक्शन जोड़े गए। बेसिन लगाई गईं। यह सब काम तो कर दिया गया। लेकिन पेयजल की समस्या में जो मूल जड़ थी उसका निदान नहीं निकाला गया। यही कारण रहा कि यह नई व्यवस्था उपयोगविहीन होकर रह गई है। स्कूलों में टोंटी से पानी की व्यवस्था न होने के कारण ही टॉयलेट का उपयोग नहीं हो पा रहा। उनकी सफाई नियमित नहीं हो पा रही। बिना पानी के शौचालय भी उपयोगविहीन हो गए हैं।
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नपा शिक्षा उपकर वसूलती है लेकिन सुविधा नहीं देती
यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि नगर पालिका शहरवासियों से विभिन्न टैक्स के अलावा शिक्षा उपकर भी वसूलती है। जिसके एवज में नगरीय क्षेत्र में स्थित सरकारी स्कूलों में आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना उसकी भी जिम्मेदारी बनती है। जैसे कि स्कूलों में बाउंड्रीवॉल बनवाना, बिजली उपलब्ध करवाना, पेयजल तथा सफाई व्यवस्था करना। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि शहरी क्षेत्र में कई स्कूल ऐसे हैं जहां न तो बाउंड्रीवॉल है और न ही सफाई व्यवस्था। स्कूल परिसर को शिक्षकों को ही साफ करवाना पड़ता है।
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जिम्मेदार का नहीं उठा फोन
शहर सहित जिले के अधिकांश सरकारी स्कूलों में शुद्ध पेयजल व्यवस्था न होने को लेकर जिला शिक्षा अधिकारी चन्द्रशेखर सिसौदिया, डीपीसी व डिप्टी कलेक्टर सोनम जैन को फोन लगाया गया लेकिन किसी ने भी फोन रिसीव नहीं किया।