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चिटफंड कंपनियों के 7 हजार निवेशकों ने किया आवेदन, पर रुपए लौटाने खातों में नहीं बैलेंस

- प्रदेश सहित देशभर निवेशकों के चिटफंड कंपनियों में फंसे हैं करोड़ों रुपए, प्रशासन सिर्फ आवेदन लेकर कंप्यूटर में दर्ज कर रहा, रुपए कैसे लौटेंगे, इसका नहीं विकल्प कंपनियों ने किराए ऑफिस लेकर किया था कारोबार

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चिटफंड कंपनियों के 7 हजार निवेशकों ने किया आवेदन, पर रुपए लौटाने खातों में नहीं बैलेंस

कलेक्ट्रेट में चिटफंड कंपनियों में निवेशक अपने रुपए वापसी के लिए आवेदन करने लाइन में खड़े।

ग्वालियर. गोल पहाडिय़ा निवासी सुनीता कुशवाह ठेला लगाकर अपना जीवन यापन करती हैं। उनके पास जीवन भारती प्राइवेट लिमिटेड का एजेंट आया। बेटी की शादी के लिए रुपए जमा करने की बात कही। बेटी की शादी पर रकम डबल झांसा दिया। उन्होंने अपनी कमाई एक-एक रुपया जोडक़र जीवन भारती में 500 रुपए महीना जमा किया। करीब 30 हजार रुपए उन्होंने कंपनी में जमा कर दिए, लेकिन उन्होंने जो रकम जमा की, वह नहीं मिली। दीपावली के बाद उनकी बेटी की शादी है, लेकिन शादी के लिए रुपए नहीं है। उन्हें पता चला कि कलेक्ट्रेट में आवेदन जमा हो रहे हैं। उन्होंने भी अपनी पॉलिसी के साथ आवेदन कर दिया। रुपए कब व कैसे मिलेंगे, उनके इस सवाल का जवाब वहा मौजूद अधिकारी व कर्मचारी के पास नहीं है। सुनीता अकेली ऐसी महिला नहीं है, जो चिटफंड में निवेश किए रुपए के इंतजार में हैं। बुधवार तक 7 हजार 200 महिला व पुरुषों ने आवेदन कर दिए हैं। किसी का एक लाख एक लाख तो किसी 50 हजार रुपए फंसा है। यदि जानकारों की मानें आम लोगों का हजार करोड़ से अधिक रुपया चिटफंड के कारोबारियों के पास फंसा है। चिटफंड कंपनियों के खातों में रुपए नहीं है। कुर्की से पहले ही खाते खाली कर दिए थे।
जिला प्रशासन ने 2011 से 2012 के बीच चिटफंड कंपनियों पर कार्रवाई की थी। इन कंपनियों ने ग्वालियर-अंचल सहित मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश सहित दक्षिण भारत में कारोबार किया। 2011 से निवेशक चिटफंड कंपनियों के एजेटों के पास घूम रहे थे, लेकिन एजेंटों ने हाथ खड़ कर दिए, क्योंकि कंपनियों के दफ्तर बंद हो गए। कंपनी के संचालकों का भी नहीं पता चला। इसके बाद लोगों ने शासन व प्रशासन से उम्मीद लगाई है कि उनका रुपया मिल जाए। इसलिए लोग कलेक्ट्रेट में आवेदन कर रहे हैं।

किराये के मकानों में संचालित थी चिटफंड कंपनियां
- चिटफंड कंपनियों ने किराए का मकान लेकर शहर में ऑफिस खोले थे। किराए के मकानों से ये संचालित हुईं। उन्होंने अपने एजेंट शहर में छोड़ दिए थे, जिन्हें अपने समाज, रिश्तेदार, दोस्त सहित अन्य को झांसे में लिया।
- 50 से अधिक कंपनियों ने ग्वालियर में अपने आफिस खोले थे, लेकिन अधिकतर कंपनियां किराये मकान में संचालित थी। जब इनके ऊपर कार्रवाई की गई, तब खातों में भी रुपये नहीं थे।
-33 कंपनियों का मुख्य ऑफिस ग्वालियर में था। ग्वालियर की कंपनियों ने दूसरे राज्यों में कारोबार किया।
- लोगों ने अपने व्यक्ति पर भरोसा कर निवेश किया, लेकिन कंपनी के बारे में पता नहीं किया।

इन कंपनियों की संपत्तियां, शहर में
- केएमजे व परिवार डेयरी, सक्षम डेयरी ने शहर में बड़ा कारोबा किया था। इनकी संपत्तियों को प्रशासन कुर्क कर चुका है। केएमजे की 63 संपत्तियां नीलाम की जा रही थी, लेकिन दूसरे राज्यों के निवेशकों ने नीलामी को हाईकोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद नीलामी पर रोक लग गई।
- परिवार डेयरी की संपत्तियां चैन्नई हाईकोर्ट के बाद पर सीबीआई ने अटैच कर ली, लेकिन प्रशासन ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में याचिका दायर की है, लेकिन इस याचिका पर फैसला नहीं सका है। इस कंपनी के 50 हजार निवेशक आवेदन कर चुके हैं।

रिश्तेदारों के रुपए भी निवेश कराए
मैंने अपने रिश्तेदार, परिवार के नामा पॉलिसी ली थी। 25 लाख रुपए से अधिक चिटफंड कंपनी में फंसा है। 11 साल से अधिक हो गए हैं, लेकिन रुपया किसी को नहीं मिला है। एक उम्मीद प्रशासन से बची है। इसलिए आवेदन कर रहे हैं।
मान सिंह कुशवाह, पीडि़त

डेटा इकट्ठा कर रहे
- चिटफंड कंपनियों के निवेशकों से अभी आवेदन लिए जा रहे हैं। आवेदनों को अलग-अलग किया जाएगा, जिससे एक आंकड़ा सामने आ सके कि किस कंपनी के कितने निवेशके हैं। कितना रुपया आम लोगों का फंसा है। शासन स्तर से फैसला होगा, उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी।