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अटल की कविताओं में जिंदगी का सार, कई लोग इनसे प्रभावित होकर आए राजनीति में

अटल की कविताओं में जिंदगी का सार, कई लोग इनसे प्रभावित होकर आए राजनीति में

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अटल की कविताओं में जिंदगी का सार, कई लोग इनसे प्रभावित होकर आए राजनीति में

ग्वालियर। अटल जी की हालत नाजुक है। वे अस्पताल में जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हालांकी उन्होंने देश के लिए दशकों तक संघर्ष ही किया है। अटल बिहारी वाजपेयी राजनेता होने के अलावा बहुत ही मशहूर कवि भी रहे हैं, । उनकी कविताओं में जीवन का संघर्ष,सच्चाई,सार्थकता आदि जिन शब्दों में पिरोऐ जाते रहे हैं वह अद्भुत हैं। आज हम आपको उनकी कुछ सबसे ज्यादा खास कविताओं के रूपरू कराएंगे। जिनमें उन्होंने जीवन का सार बताया है।

"क्या खोया क्या पाया जग में" "जो कल थे,वे आज नहीं हैं।" "एक बरस बीत गया"











क्या खोया क्या पाया जग में
मिलते और बिछड़ते मग में
मुझे किसी से नहीं शिक़ायत
यद्द्पि छला गया पग पग में
एक दृष्टि बीती पर डालें
यादों की पोटली टटोलें
अपने ही मन से कुछ बोलें


पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएँ
यद्द्पि सौ शरदों की वाणी


इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक
पर ख़ुद दरवाज़ा खोलें
अपने ही मन से कुछ बोलें


जन्म मरण का अविरत फेरा
जीवन बंजारों का डेरा
आज यहां कल कहाँ कूच है
कौन जानता किधर सवेरा


अँधियारा आकाश असीमित
प्राणों के पंखों को तौलें
अपने ही मन से कुछ बोलें


- अटल बिहारी वाजपेयी



जो कल थे,
वे आज नहीं हैं।
जो आज हैं,
वे कल नहीं होंगे।
होने, न होने का क्रम,
इसी तरह चलता रहेगा,
हम हैं, हम रहेंगे,
यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा।



सत्य क्या है?
होना या न होना?
या दोनों ही सत्य हैं?
जो है, उसका होना सत्य है,
जो नहीं है, उसका न होना सत्य है।
मुझे लगता है कि
होना-न-होना एक ही सत्य के
दो आयाम हैं,
शेष सब समझ का फेर,
बुद्धि के व्यायाम हैं।
किन्तु न होने के बाद क्या होता है,
यह प्रश्न अनुत्तरित है।



प्रत्येक नया नचिकेता,
इस प्रश्न की खोज में लगा है।
सभी साधकों को इस प्रश्न ने ठगा है।
शायद यह प्रश्न, प्रश्न ही रहेगा।
यदि कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहें
तो इसमें बुराई क्या है?
हाँ, खोज का सिलसिला न रुके,
धर्म की अनुभूति,
विज्ञान का अनुसंधान,
एक दिन, अवश्य ही
रुद्ध द्वार खोलेगा।
प्रश्न पूछने के बजाय
यक्ष स्वयं उत्तर बोलेगा।



- अटल बिहारी वाजपेयी



एक बरस बीत गया
झुलसाता जेठ मास
शरद चाँदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया


सींकचों में सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अंबर तक
गूँज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया


पथ निहारते नयन
गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आएगा
मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया


- अटल बिहारी वाजपेयी


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