तो इसलिए ग्वालियर नहीं बन पाया था राजधानी, इस शख्स का था हाथ
मध्यप्रदेश आज पूरे 60 साल का हो चुका है। 1 नवम्बर 1956 को अविभाजित मध्य प्रदेश की स्थापना की गई। तत्कालीन प्रांत मध्य भारत, सीपी बरार, विध्यं प्रदेश और भोपाल स्टेट को मिलाकर एक नए राज्य की स्थापना हुई, जिसे मध्यप्रदेश कहा गया।
ग्वालियर। मध्यप्रदेश आज पूरे 60 साल का हो चुका है। 1 नवम्बर 1956 को अविभाजित मध्य प्रदेश की स्थापना की गई। तत्कालीन प्रांत मध्य भारत, सीपी बरार, विध्यं प्रदेश और भोपाल स्टेट को मिलाकर एक नए राज्य की स्थापना हुई, जिसे मध्यप्रदेश कहा गया।
जानकार बताते हैं कि ग्वालियर रियासत उस वक्त काफी प्रभाव रखती थी और ये तय माना जा रहा था कि नए प्रदेश की राजधानी ग्वालियर को ही बनाया जाएगा। मगर सियासत में कुछ कहा नहीं जा सकता और हुआ भी यही। इंदौर और ग्वालियर की प्रतिस्पर्धा में भोपाल को प्रदेश की राजधानी बनाया गया।
1 नवम्बर 1956 में भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी बना। लेकिन तब राजधानी बनने की कतार में ग्वालियर के साथ इंदौर का नाम भी उछला था। दरअसल एक नवंबर 1956 को मध्य प्रदेश गठन के साथ इसकी राजधानी को लेकर कई और शहरों के नाम सामने आए। जिनमें जबलपुर भी शामिल था।
भोपाल के नवाब चाहते थे पाकिस्तान में मिलना
इधर भोपाल के नवाब भारत के साथ संबंधों को लेकर विरोध में थे। उधर केंद्र सरकार राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के खिलाफ थी। तब देश के प्रधानमंत्री पं नेहरू थे. नेहरू ने सरदार पटेल को देश के एकीकरण का जिम्मा सौंपा था। देश के ह्रदय स्थल का बढ़ता विरोध देख सरदार पटेल को इस पर निर्णय लेना पड़ा और उन्होंने भोपाल को मध्यप्रदेश की राजधानी के रूप में चुन लिया।
कुछ जानकार ये भी कहते हैं कि ग्वालियर को राजधानी न बनाने के पीछे ये भी तर्क था कि नाथूराम गोड़से को महात्मा गांधी की हत्या के लिए बंदूक ग्वालियर से मिली थी और उनकी हत्या में ग्वालियर के लोगों ने मदद की थी। ग्वालियर के विरोध की ये भी एक बड़ी वजह थी।
उधर ग्वालियर और इंदौर की रियासते भी इसके लिए राजी नहीं थी, क्योंकि दोनों ही राज्य उस समय देश के धनी राज्यों में से एक थे। बाद में ग्वालियर और इंदौर के झगड़े निपटाने के लिए पूरे मध्यभारत को नए राज्य में मिला दिया गया।