
विश्व ने एक सदी में कृषि जैव विविधता का 75 फीसदी हिस्सा खो दिया, लेकिन भारत में यह बदलाव मुख्यरूप से 1960 के दशक में हरित क्रांति के बाद आया।(Photo- Patrika)
आपने कभी गौर किया कि जो मक्के का भुट्टा आप बचपन से खाते आए, उसकी जगह दुकानों पर चुपके से ‘स्वीट कॉर्न’ ने ले ली है, जो शुद्ध रूप से मानकीकृत अमेरिकी किस्म है। स्थानीय जलवायु में तैयार होने वाली अनगिनत फल-सब्जी और अनाज की प्रजातियों को फूड इंडस्ट्री ने हमसे दूर कर दिया, जिन्हें खाकर पीढ़ियां पोषण पाती रहीं। अब सिर्फ चुनिंदा किस्मों का ही बाजार पर कब्जा है, बाकी या तो अतीत का हिस्सा बन गई या उनका प्रयोग सिमट कर रह गया।
राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी (एनएएस) ने हाल ही देश की ऐसी उपेक्षित फल-सब्जियों को मुख्यधारा में लाने की रूपरेखा पेश की है, जिन्हें ‘भविष्य की फसलें’ कहा जा रहा है। एनएएस की रिपोर्ट में दुनिया में फलों की 5400 में से 28 और सब्जियों की 1097 किस्मों में सिर्फ 20 ही करीब 95 प्रतिशत ही मुख्यरूप से उगाई जा रही हैं। जबकि संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार सिर्फ 9 फसलें ही वैश्विक उत्पादन में 66 प्रतिशत हिस्सा रखती हैं।
भारत की बात करें तो आम, केला और सेब जैसे फल 72 प्रतिशतक उत्पादन क्षेत्र को कवर करते हैं। इस वैश्विक बदलाव से कुछ लोगों के लिए खेती ज्यादा लाभदायक हो गई, जबकि छोटे किसानों को स्थानीय फसलें छोड़नी पड़ी। जो पीढ़ियों से ऐसी फसलों को करते आ रहे थे।
कृषि विविधता में यह कमी जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने के साथ ही पोषण, आजीविका और वैश्विक खाद्य प्रणालियों की स्थिरता पर भी गहरा असर डालती हैं। एएएफओ के मुताबिक इससे दुनिया में लगभग दो अरब लोग पारंपरिक पोषक तत्त्वों की कमी का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर कुछ ही फसलों पर निर्भर रहने से खाद्य प्रणालियां जलवायु परिवर्तन के अप्रत्याशित प्रभावों के प्रति अत्यंत संवेदनशील हो जाती हैं। आनुवांशिक रूप से तैयार फसलें कीटों, बीमारियों और जलवायु चिंताओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती हैं, जबकि स्वदेशी फसलें जरूरी पोषक तत्त्वों से भरपूर होती हैं।
विश्व ने एक सदी में कृषि जैव विविधता का 75 फीसदी हिस्सा खो दिया, लेकिन भारत में यह बदलाव मुख्यरूप से 1960 के दशक में हरित क्रांति के बाद आया। उस वक्त अकाल और भुखमरी के कारण खाद्यान्न उत्पादन में निर्भरता जरूरी थी। इसलिए उर्वरक, सिंचाई और कीटनाशकों के इस्तेमाल से उत्पादन में कई गुना बढ़ोतरी हुई, लेकिन इसके बाद मोटे अनाज की जगह गेहूं और चावल की खेती ही होने लगी।
दुनिया के बाजारों ने न्यूट्रिशन नहीं बल्कि सुविधाओं के आधार पर इन किस्मों का चुनाव किया है। ज्यादातर उगाई जाने वाली फसलें ज्यादा लंबे समय तक सुरक्षित रहती हैं। उन्हें दूर तक बिना खराब हुए सप्लाई किया जा सकता है।
आलू (17%), टमाटर (14 %), प्याज (9%), गोभी (7%), खीरा (6 %) और शिमला मिर्च (4%)
केला (20), सेब (11), संतरा (10), अंगूर (7) और आम (6)
1.अमृत फसल के रूप में मिले पहचान
2.खेती और उत्पाद बदलने से बढ़ेगी आय
जयपुर के जोबनेर स्थित श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. पुष्पेंद्र सिंह चौहान कहते हैं- 'खेती में यह बदलाव बाजार-केन्द्रित कृषि और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की वजह से आया है, जहां अधिक उपज, एकरूपता और लंबी शेल्फ-लाइफ को पोषण और स्थानीय अनुकूलता से ऊपर रखा गया। इसका नतीजा यह हुआ कि पारंपरिक, पोषक और जलवायु-सहिष्णु फसलों का उपयोग लगातार सिमटता चला गया। जब हम विविधता खोते हैं, तो हम न केवल स्वाद खोते हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और नई बीमारियों के खिलाफ अपनी लड़ने की क्षमता भी खो देते हैं।
उन्होंने आगे कहा, भारत जैसे देश में, जहां कुपोषण और एनीमिया एक बड़ी चुनौती है, वहां सहजन (मोरिंगा), जामुन, आंवला और बथुआ जैसी पारंपरिक फसलों को 'अमृत फसल' बनाना समय की मांग है। ये फसलें न केवल 'न्यूट्री-बास्केट' हैं, बल्कि कम पानी और खराब मिट्टी में भी जीवित रहने वाली 'क्लाइमेट स्मार्ट' फसलें भी हैं। अब जरूरत है कि इन ‘खोई हुई फसलों’ को पोषण सुरक्षा और जलवायु समाधान के रूप में दोबारा स्थापित किया जाए। इसके लिए सरकारों को न्यूनतम समर्थन मूल्य, बीज संरक्षण, अनुसंधान और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देना चाहिए। साथ ही मिड-डे मील, आंगनवाड़ी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में इन्हें शामिल कर स्थायी मांग पैदा करनी होगी, ताकि किसान और उपभोक्ता दोनों लाभान्वित हों। 'भविष्य की फसलें' प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि हमारे खेतों और जंगलों में सुरक्षित हैं, जिन्हें मुख्यधारा में लाना समय की आवश्यकता है।
Updated on:
25 Jan 2026 01:41 am
Published on:
25 Jan 2026 01:39 am
बड़ी खबरें
View Allबिहार चुनाव
राष्ट्रीय
ट्रेंडिंग
