
ग्वालियर-चंबल और बुंदेलखंड में जातियों का गणित हर चुनाव में हार-जीत का समीकरण तय करता है। जातियों के अपने समाज हैं और उनके अपने नेता। कहीं गुर्जर मतदाता प्रभावी हैं तो कहीं तोमर का बोलबाला है। किसी सीट पर पटेल-कुशवाह हार-जीत तय करते हैं तो किसी पर जाटव का जलवा है। राजपूत, ब्राह्मण, यादव समाज के असर वाली सीटें भी हैं। भाजपा-कांग्रेस हों या सपा-बसपा, उम्मीदवार उतारने से पहले जातीय गणित को समझते हैं। यह जानना दिलचस्प है कि कौन सी जाति कितनी सीटों को प्रभावित करती है, क्योंकि 230 सीटों में से 190 से ज्यादा सीटों पर कॉस्ट यानी जाति सबसे बड़ा चुनावी फैक्टर होता है।
किरार-धाकड़ समाज का यहां प्रभाव
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान किरार-धाकड़ समाज से हैं। शिवराज सिंह चौहान चुनाव में हैं, स्टार प्रचारक हैं, लेकिन सीएम चेहरे की उलझन में इस समाज की बेरुखी साफ झलक रही है। पोहरी में धाकड़ समाज से सिंधिया समर्थक उम्मीदवार हैं। यहां एक अन्य धाकड़ नेता चुनाव मैदान में हैं। समाज प्रदेश की 19 सीटों पर अपना असर मानता है। यहां किरार धाकड़ समाज के उम्मीदवार उतारने की मांग भी की जाती रही है।
यादव मतदाताओं का बुंदेलखंड तक प्रभाव
शिवपुरी में कोलारस सीट पर कांग्रेस-भाजपा प्रत्याशी यादव हैं। दोनों रिश्तेदार होते हुए भी आमने-सामने हैं। भितरवार में लाखन सिंह कांग्रेस उम्मीदवार हैं, उज्जैन में मोहन यादव भाजपा प्रत्याशी हैं। बुंदेलखंड में निवाड़ी, पृथ्वीपुर सीटों पर यादव समाज का प्रभाव है। सपा भी इस वोट बैंक के आधार पर उतरी है। कांग्रेस ने बिजावर से चरणसिंह यादव को टिकट दिया है। कांग्रेस ने सागर के देवरी में हर्ष यादव पर दांव लगाया है। 80 लाख से ज्यादा जनसंख्या वाले यादव समाज में वोटर करीब 14त्न हैं। प्रभाव ग्वालियर, बुंदेलखंड अंचल की सीटों पर है।
कुशवाह का दबदबा 23 विधानसभा पर
कुशवाह समाज के प्रभाव को देखते हुए भाजपा ने पिछड़ा वर्ग मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष की कमान नारायण सिंह कुशवाह को सौंपी। इन्हें ग्वालियर दक्षिण सीट पर उम्मीदवार भी बनाया है। नारायण सिंह ने पहली बार मंच से सार्वजनिक तौर पर ज्योतिरादित्य सिंधिया को कुर्मी समाज का बताकर जाति को साधने का प्रयास किया था। राज्यमंत्री भारतसिंह कुशवाह को ग्वालियर ग्रामीण विस से फिर उतारा है। मध्यप्रदेश में कुशवाह समाज की आबादी भी लगभग 80 लाख है। इस समाज का दबदबा 23 विधानसभा सीटों पर है।
ब्राह्मण 60 व राजपूत 45 सीट पर निर्णायक
सरकार ने ब्राह्मण कल्याण बोर्ड गठन की घोषणा के साथ इन्हें साधने का प्रयास किया। गोपाल भार्गव को प्रचार में भावी सीएम बताकर लोगों को लुभाया जा रहा है। राजपूत-क्षत्रिय समाज भी ग्वालियर-चंबल, बुंदेलखंड में चुनाव की धुरी होता है। नरेंद्र सिंह तोमर को दिमनी से टिकट देकर वोटर को साधने का प्रयास किया गया। इस समाज के सागर, टीकमगढ़, छतरपुर, ग्वालियर, भिण्ड-मुरैना जिले प्रभाव वाले हैं। ब्राह्मण मतदाता प्रदेश की 60 सीटों को प्रभावित करते हैं, वहीं राजपूत मतदाता 45 सीटों पर असर डालते हैं।
गुर्जर की नाराजगी का क्या असर
ग्वालियर-चंबल में गुर्जर मतदाता भी एकजुट माना जाता है। इनके लिए चुनाव में जाति की अहमियत होती है। ऐसे में राजनीतिक दल भी इनका ख्याल रखते हैं। हाल में अंचल के एक बड़े गुर्जर आंदोलन के बाद पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई इनकी नाराजगी की वजह बन गई। सम्राट मिहिर भोज को लेकर विवाद हुआ था। अब ग्वालियर जिले की ग्रामीण सीट और मुरैना विधानसभा में इस समाज के प्रत्याशी हैं। प्रदेश में 35 लाख लोगों के साथ गुर्जर समाज चुनाव में प्रभावशाली माना जाता है। कोई दल इनकी नाराजगी नहीं लेता।
लोधी मतदाता माना या दीदी के साथ रूठा
शिवपुरी की पिछोर सीट लोधी बहुल है। यहां भाजपा ने प्रीतम लोधी को उम्मीदवार बनाया तो कांग्रेस ने अरविंद लोधी पर दांव खेला। दोनों ही दलों ने लोधी मतदाताओं को ध्यान में रखा। टीकमगढ़ में खरगापुर से भाजपा ने उमा भारती के भतीजे राहुल सिंह लोधी को चुनाव से पहले राज्यमंत्री का दर्जा दिया और फिर उम्मीदवारी। राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि जिन सीटों पर लोधी उम्मीदवार हैं, वहां तो वोटर उनके पाले में आएगा। 65 सीटों पर निर्णायक वोटर प्रदेश में कुल वोटर में लगभग नौ फीसदी लोधी हैं। यह प्रदेश की 65 विधानसभा सीटों को प्रभावित करते हैं। इसी को राजनीतिक दल ध्यान में रखते हैं।
Updated on:
14 Nov 2023 10:38 am
Published on:
14 Nov 2023 10:36 am
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