
tighara dam
ग्वालियर. शहर की प्यास बुझाने वाला तिघरा बांध अब सैलानियों के लिए मौत का बांध साबित हो रहा है। पिछले दो वर्षों के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि तिघरा में अब तक 8 सैलानियों की डूबने से दर्दनाक मौत हो चुकी है। सबसे ज्यादा हादसे बांध के दूसरे छोर यानी कच्ची पार पर हो रहे हैं। इसके बावजूद बांध की सुरक्षा और मॉनिटङ्क्षरग को लेकर जिम्मेदार ङ्क्षसचाई विभाग, पुलिस और जिला प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जब भी कोई बड़ी त्रासदी होती है, तो प्रशासन दो दिन की मुस्तैदी दिखाता है, लेकिन मामला ठंडा होते ही सब पुराने ढर्रे पर लौट आता है।
कैथा और पार गांव के निवासियों के अनुसार, बांध का कच्ची पार वाला हिस्सा बेहद खतरनाक है। यहां पानी की गहराई अचानक बढ़ती है और नीचे गहरे गड्ढे व गाद है। दो दिन पहले शनिवार (13 जून) को भी इसी कच्ची पार पर मेडिकल छात्रों की टोली को मस्ती करते देखा गया था, जहां दो होनहारों का दर्दनाक अंत हो गया। इससे ठीक 20 दिन पहले भी इसी जगह तारागंज के दो युवकों की डूबने से जान चली गई थी। सबको पता है कि यह इलाका डेथ पॉइंट बन चुका है, लेकिन यहां न तो कोई बैरिकेङ्क्षडग है और न ही सुरक्षा गार्डों की तैनाती।
तिघरा बांध की अथाह गहराई में जब आधुनिक कैमरों और उपकरणों से लैस सरकारी रेस्क्यू टीमें हार मान जाती हैं, तब भगपुरा निवासी विजय ङ्क्षसह कुशवाह देवदूत बनकर सामने आते हैं। पेशे से पत्थर तोडऩे की मजदूरी करने वाले विजय ङ्क्षसह ने ही 13 जून को 35 फीट गहरे ठंडे पानी में गोता लगाकर मेडिकल छात्र आयुष का शव ढूंढा था। विजय ङ्क्षसह पिछले 3 साल में रेस्क्यू टीम के साथ मिलकर तिघरा और महेदपुर डैम से 5 शव निकाल चुके हैं। वे पानी के भीतर बिना किसी ऑक्सीजन सिलेंडर के 12 से 15 मिनट तक अपनी सांस रोक सकते हैं, इसलिए हर बड़े हादसे के समय प्रशासन सबसे पहले विजय ङ्क्षसह को ही याद करता है।
कच्ची पार हिस्से पर जाना पूरी तरह प्रतिबंधित और खतरनाक है। लोग गाडिय़ों से वहां न पहुंच सकें, इसलिए हमने उस तरफ जाने वाले कच्चे रास्तों को जेसीबी से खुदवा दिया है। साथ ही जगह-जगह खतरे के चेतावनी बोर्ड भी लगाए गए हैं।
शिवराम कंसाना, थाना प्रभारी, तिघरा
Published on:
16 Jun 2026 05:49 pm
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