
हाईकोर्ट की युगल पीठ ने सरफेसी अधिनियम के तहत बैंक के अधिकारों को लेकर बड़ा और स्पष्ट फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र यादव की खंडपीठ ने यूको बैंक की याचिका स्वीकार करते हुए डीआरटी जबलपुर और डीआरएटी इलाहाबाद के आदेशों को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि बैंक को हर हाल में जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की सहायता लेना अनिवार्य नहीं है, यदि वह कानून के तहत स्वयं शांतिपूर्वक कब्जा लेने में सक्षम है।
मामला यूको बैंक और आशा ऑयल इंडस्ट्रीज मालनपुर से जुड़ा है। बैंक ने करीब 5 करोड़ रुपये के ऋण की वसूली के लिए सरफेसी अधिनियम के तहत कार्रवाई की थी। ऋण खाते को 31 अक्टूबर 2018 को एनपीए घोषित किया गया था। इसके बाद बैंक ने नियमों के अनुसार नोटिस जारी कर संपत्तियों पर कब्जा लिया और नीलामी प्रक्रिया शुरू की। हालांकि, डीआरटी जबलपुर ने 28 सितंबर 2021 को बैंक को आदेश दिया था कि वह उधारकर्ताओं को संपत्तियों का भौतिक कब्जा लौटाए और नीलामी खरीदार की जमा राशि वापस करे। इस आदेश को डीआरएटी इलाहाबाद ने भी 14 मई 2025 को बरकरार रखा।
हाईकोर्ट ने इन आदेशों को कानून के विपरीत मानते हुए कहा कि सरफेसी अधिनियम की धारा 13(4) बैंक को यह अधिकार देती है कि वह आवश्यक नोटिस जारी कर स्वयं संपत्तियों का कब्जा ले सकता है। धारा 14 का सहारा केवल तब लिया जाता है, जब बैंक को प्रशासनिक सहायता की जरूरत हो या प्रतिरोध का सामना करना पड़े। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डीआरटी और डीआरएटी का यह मानना कि बिना धारा 14 की प्रक्रिया अपनाए कब्जा लेना अवैध है, कानून की गलत व्याख्या है।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जिस फैक्ट्री और मकान पर कब्जा लिया गया, वहां कोई निवास नहीं था और कोई प्रतिरोध भी नहीं हुआ। ऐसे में जबरन कब्जे का आरोप टिकाऊ नहीं है। साथ ही यह भी कहा गया कि सात वर्षों से उधारकर्ता ने न तो बकाया राशि चुकाई और न ही सरफेसी की धारा 13(8) के तहत राहत ली।
Updated on:
29 Jan 2026 11:25 am
Published on:
29 Jan 2026 11:25 am
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