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सरकारी जमीन के दुरुपयोग में अधिकारी भी जिम्मेदार : कोर्ट

ग्वालियर. हाईकोर्ट ने सरकारी जमीन से जुड़े मामलों में बरती जा रही लापरवाही और अदालत को गुमराह करने के प्रयासों पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने प्रमुख सचिव, राजस्व विभाग द्वारा प्रस्तुत जवाब को न्यायालय के साथ धोखाधड़ी करार देते हुए कहा कि राज्य सरकार और मुख्य सचिव पर सरकारी संपत्ति की रक्षा का […]

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ग्वालियर. हाईकोर्ट ने सरकारी जमीन से जुड़े मामलों में बरती जा रही लापरवाही और अदालत को गुमराह करने के प्रयासों पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने प्रमुख सचिव, राजस्व विभाग द्वारा प्रस्तुत जवाब को न्यायालय के साथ धोखाधड़ी करार देते हुए कहा कि राज्य सरकार और मुख्य सचिव पर सरकारी संपत्ति की रक्षा का संवैधानिक दायित्व है, लेकिन इसके विपरीत उच्च पदों पर बैठे अधिकारी दुरुपयोग को रोकने के बजाय उसे बढ़ावा देते दिखाई दे रहे हैं। अदालत ने इस स्थिति को बेहद गंभीर और ङ्क्षचताजनक बताया है।

मामला दीनापुर क्षेत्र में सीङ्क्षलग के तहत अधिग्रहित जमीन से जुड़ा है, जिसमें राज्य शासन ने पुन: सुनवाई के लिए अपील दायर की है। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि राजस्व विभाग के स्तर पर लंबे समय तक फाइलें दबाकर रखी गईं और सही जानकारी अदालत के सामने नहीं रखी गई।

जांच रिपोर्ट छिपाने पर भी कोर्ट सख्त

अदालत ने यह भी दर्ज किया कि 19 जनवरी 2026 के आदेश के साथ जांच रिपोर्ट संलग्न नहीं की गई थी। निर्देश के बाद केवल नोटशीट््स पेश की गईं, लेकिन वह मूल फाइल प्रस्तुत नहीं की गई, जिसमें वर्ष 2012 के आदेशों और उनके खिलाफ अपनाए जाने वाले उपायों की स्क्रूटनी थी। कोर्ट ने इसे न्यायालय के साथ फ्रॉड करने की कोशिश माना। रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि 2016 से 2018 के बीच कलेक्टर, ग्वालियर द्वारा भेजे गए कई पत्रों को राजस्व विभाग में सक्षम स्तर पर रखने में महीनों की देरी की गई, जिस पर कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है।

फाइल दबाने वालों की पहचान के निर्देश

कोर्ट ने प्रमुख सचिव, राजस्व विभाग को अंतिम अवसर देते हुए निर्देश दिया है कि वे 28 सितंबर 2016 तक फाइल पर बैठे अधिकारियों और 7 जनवरी 2017 के बाद जिन-जिन टेबलों पर प्रस्ताव लंबित रहा, उन सभी जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान करें। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि फाइलें किन कारणों से लंबित रहीं और अब तक क्या कार्रवाई की गई। मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी।

भ्रामक जवाब देकर असली दोषियों को बचाने की कोशिश

यह नाराजगी हाईकोर्ट ने राज्य शासन बनाम रामदयाल अन्य मामले की सुनवाई के दौरान जताई। अदालत ने कहा कि प्रमुख सचिव द्वारा पहले दाखिल किया गया जवाब तथ्यात्मक रूप से गलत और भ्रामक था। देरी का पूरा दोष अधिकारी नेहा तमडे पर डालते हुए यह तर्क दिया गया कि उन्होंने 2021 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली है, इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई संभव नहीं है। अदालत ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह वास्तविक दोषियों को बचाने का प्रयास है।