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एआई, सोशल मीडिया और शब्दों की गरिमा पर कवियों की बेबाक राय

हास्य सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को सोचने पर मजबूर करने का माध्यम है।

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हास्य सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को सोचने पर मजबूर करने का माध्यम है।

ग्वालियर में आयोजित कवि सम्मेलन में शामिल होने आए थे पद्मश्री से सम्मानित हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा

जो रियल नहीं, वो रियल को कैसे चुनौती दे सकता है: सुरेन्द्र शर्मा

ग्वालियर. साहित्य और हास्य के मंच से इस बार तकनीक, सामाजिक सरोकार और शब्दों की मर्यादा जैसे गंभीर विषयों पर बेबाक राय सामने आई। आयोजित कवि सम्मेलन में देश के प्रतिष्ठित कवियों ने एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), सोशल मीडिया पर बढ़ती वल्गैरिटी और कविता की गरिमा पर अपने विचार रखे। कवियों का कहना था कि कवि सम्मेलन ने साबित कर दिया कि हास्य सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को सोचने पर मजबूर करने का माध्यम भी है। ये कवि रविवार को ग्वालियर में आयोजित कवि सम्मेलन में शामिल होने आए थे। इस दौरान पत्रिका से विशेष बातचीत की। पद्मश्री से सम्मानित हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर उठ रही आशंकाओं पर कहा, जो रियल नहीं है, वह रियल को कैसे चुनौती दे सकता है। एआइ इंसान की संवेदनाओं, अनुभव और भावनाओं का विकल्प नहीं बन सकता। सुरेन्द्र शर्मा ने कहा, कविता, व्यंग्य और हास्य केवल शब्दों का खेल नहीं बल्कि जीवन के अनुभवों से उपजते हैं, जिसे मशीन कभी पूरी तरह नहीं समझ सकती। उन्होंने कहा, तकनीक सहायक हो सकती है, लेकिन सृजन का मूल स्रोत मानव मन ही रहेगा। उन्होंने कहा, तकनीक से डरें नहीं, बल्कि उसे अपने ज्ञान और सृजनशीलता को बढ़ाने का माध्यम बनाएं।

कवि सम्मेलन में शब्दों की मर्यादा है, जो कायम है: गजेन्द्र सोलंकी

वरिष्ठ कवि गजेन्द्र सोलंकी ने कवि सम्मेलन की गरिमा और शब्दों की मर्यादा पर जोर देते हुए कहा, कवि सम्मेलन मनोरंजन का माध्यम जरूर है, लेकिन यहां भाषा और भाव की मर्यादा हमेशा सर्वोपरि रही है। उन्होंने कहा, हास्य और व्यंग्य का अर्थ फूहड़ता नहीं होता। कवियों की जिम्मेदारी है कि वे समाज को हंसाते हुए सोचने पर भी मजबूर करें। गजेन्द्र सोलंकी ने कहा, मंचीय कविता ने हमेशा सामाजिक मुद्दों पर संवेदनशीलता के साथ अपनी बात रखी है। उन्होंने कहा, बदलते दौर में कवियों को अपनी प्रस्तुति में शालीनता बनाए रखनी चाहिए ताकि साहित्य की साख बनी रहे।

सोशल मीडिया पर फैल रही वल्गैरिटी का विरोध होना चाहिए: शुक्ल

कवि डॉ. प्रवीण शुक्ल ने सोशल मीडिया पर बढ़ती अश्लीलता और स्तरहीन कंटेंट पर चिंता जताते हुए कहा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर वल्गैरिटी को बढ़ावा देना समाज के लिए घातक है। उन्होंने कहा, सोशल मीडिया आज सबसे बड़ा मंच बन चुका है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। युवा पीढ़ी जिस कंटेंट को देख रही है, उसका सीधा असर उनके विचार और संस्कारों पर पड़ रहा है। इस प्रवृत्ति का खुलकर विरोध होना चाहिए और सकारात्मक, सृजनात्मक कंटेंट को बढ़ावा देना चाहिए।