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बिना कहे जो मित्र का दु:ख समझे वही सच्चा मित्र है : संत राम प्रसाद

- रामद्वारा में श्रीमद्भागवतकथा सप्ताह ज्ञानयज्ञ

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बिना कहे जो मित्र का दु:ख समझे वही सच्चा मित्र है : संत राम प्रसाद

बिना कहे जो मित्र का दु:ख समझे वही सच्चा मित्र है : संत राम प्रसाद

ग्वालियर. मित्र के कहे बिना जो मित्र के चेहरे का भाव पढक़र मित्र के दु:ख को जान ले एवं उसकी मदद करे वही सच्चा मित्र है। जैसे तीनों लोकों के स्वामी द्वारिकाधीश भगवान श्रीकृष्ण ने गरीब ब्राह्मण मित्र सुदामा को बिना जताए, बिना बताए उनकी मदद की क्योंकि वो जानते थे कि गरीब सुदामा संकोच एवं स्वाभिमान के कारण कुछ नहीं मांगेंगे। इसके साथ ही पूछने पर उनके सम्मान को ठेस भी लगेगी परंतु उनके पैरों के छालों को देखकर भगवान ने मित्र की आर्थिक स्थिति का आंकलन कर लिया और रातों-रात सुदामा की गरीब कुटिया को महल में परिवर्तित कर दिया। उक्त विचार राम द्वारा लक्ष्मीगंज में चल रही श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान महायज्ञ में अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के संत रामप्रसाद महाराज ने गुरुवार को कथा के अंतिम दिन व्यक्त किए। कृष्ण सुदामा प्रसंग को सुनाते हुए उन्होंने कहा कि संकट एवं जरूरत के समय मित्र को अहसान जताए बिना, मित्र के स्वाभिमान की रक्षा के साथ की गयी मदद सच्ची मित्रता की पहचान है। कृष्ण एवं सुदामा की दोस्ती मित्रता का आदर्श उदाहरण है जो ये संदेश देता है कि मित्रता अमीरी-गरीबी का भेद नहीं करती, बुरे समय में साथ रहे दोस्तों को अच्छा समय आने पर नजरंदाज नहीं करना चाहिए। मित्र द्वारा लाई गई भेंट को उसके मूल्य के आधार पर आंकलन न करके उसमें छिपे प्रेम को देखना चाहिए जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा द्वारा लाये गए तीन मुटठी चावलों के स्वाद में 56 भोग से भी ज्यादा आनंद पाया और तीन मुठ्ठी चावल के बदले सुदामा की दरिद्रता दूर कर दी। जैसे स्वयं द्वारिकाधीश तीनों लोकों के स्वामी जिस सुदामा के मित्र हों वो गरीब हो ही नहीं सकता, वैसे ही श्रीकृष्ण जैसा सच्चा मित्र होने पर कोई दु:खी नहीं हो सकता है।

गुरु के ज्ञान को जीवन में उतारने वालों का जीवन रहता है खुशहाल
संत रामप्रसाद ने भगवान कृष्ण के गोलोकधाम जाने की लीला को कहा एवं नव योगेश्वर की कथा को विस्तार से बताया। भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु के माध्यम से बताया कि जिसको शिक्षा लेनी है वह कहीं से भी शिक्षा ले सकता है और जिसको शिक्षा नहीं लेनी है वह सत्संग में आकर भी अधूरा रह जाता है। 24 गुरुओं के माध्यम से बताया कि जिंदगी आनंदित रहने के लिए है, उदास रहने के लिए नहीं है, निराश रहने के लिए नहीं है। जीवन उसी का खुशहाल होता है जिसने गुरुओं के ज्ञान को जीवन में उतारा है। श्रीमद्भागवत कथा का विराम पूर्णाहुति के साथ हुआ।