
जिस बच्ची को पिता ने छोड़ दिया था अनाथ आश्रम उसे 17 साल बाद ढूंढ निकाला बड़ी बहन ने
ग्वालियर. ढाई साल की मासूम को एक दिन अचानक उसका पिता बाल निकेतन छोड़ गया। परिवार को उसकी मौत की दास्तां सुनाई। इसके बाद परिवार बिखर गया, लेकिन 17 साल बाद जब बड़ी बहन को मालूम चला कि उसकी बहन जिंदा है तो उसको तलाशती हुई वह बाल निकेतन पहुंच गई।
बाल निकेतन से उसे आश्रम भेजा गया जहां उसकी छोटी बहन है। मंगलवार को वह अपनी बहन को लेने आई। इस बीच जिंदगी बहुत बदल गर्ई, पर बिछड़ी बहनें एक-दूसरे से मिली तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। छोटी बहन को गले लगाया तो दोनों के आंसू बह निकले। वहां मौजूद सभी की आंखें नम हो गईं। एक तरफ बचपन से जिनके बीच रही उनसे जुदाई का गम था तो दूसरी तरफ अपनी बहन और परिवार से मिलने की चाहत थी। अब वह 19 साल की हो चुकी थी और उसने बहन के साथ परिवार के पास जाने का फैसला किया।
बीमार रहती थी, इसलिए छोड़ दिया, घरवालों से कहा- मर गई
आदर फाउंडेशन में रहने वाली महक 17 साल बाद उस घर में लौट गई, जहां से कभी उसके पिता लाकर बाल निकेतन छोड़ गए थे। बताते हैं उसका कसूर सिर्फ इतना था कि वह बार-बार बीमार पड़ जाती थी। पिता ने घर जाकर कह दिया कि वह मर गई है। सभी ने इस बात पर यकीन भी कर लिया।
जब पिता के दोस्त ने खोला राज तो बहन को ढूंढने निकली बहन
इस बात को सालों बीत गए। सभी उस मासूम को भूल से गए, लेकिन एक दिन पिता के दोस्त ने छोटी बच्ची के गायब होने का राज उगल दिया। पिता ने शराब के नशे में दोस्त के सामने हकीकत बयां की थी। दोस्त ने बड़ी बहन को बताया कि उसकी छोटी बहन को पिता बाल निकेतन में छोड़ आए थे।
एक ही शहर में रहकर सालों तक अपनों से दूर रही महक
महक की परवरिश बाल निकेतन में होती रही। वह 11वीं कक्षा में पहुंच गई। इस बीच वह शांति निकेतन आश्रम में रहने चली गई। इसके बाद थाटीपुर में आदर फाउंडेशन आई। यहां रहते हुए वह इस बात से अनजान थी कि इसी शहर में उसके अपने भी हैं।
घर जाकर फोन किया, बोली आपकी याद आ रही है आंटी
फाउंडेशन की अध्यक्ष जूली जुनेजा ने बताया कि महक सबकी लाडली थी। वे भी उसकी हर इच्छा पूरी करती थी। अपनी बहन के साथ वह चली गई तब भी हमें नहीं भूल पाई। उसने साथ रहने वाली सात अन्य बच्चियों से फोन पर बात की और कहा आप सभी की बहुत याद आ रही है।
पहले घर छूटा, जिंदगी का रुख एक बार फिर बदलेगा
महक की परवरिश आश्रम में रहने वाली अन्य बच्चियों की तरह हुई। सभी के लिए वह अनाथ थी, उसका कोई मजहब नहीं था। वह पूजा-पाठ करने लगी और नवरात्र के व्रत करती। व्रत भी सिर्फ लौंग खाकर करती। वह भी मानती है कि थोड़ा मुश्किल होगा, लेकिन अब अपने परिवार के हिसाब से एक बार फिर खुद को ढालना पड़ेगा।
Published on:
25 Dec 2019 01:03 am
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