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isro scientist इसरो में मंगलयान और चंद्रयान को सफल बनाया ग्वालियर की इस महिला ने, मिसाइलमैन अब्दुल कलाम ने भी की तारीफ अब इंडस्ट्री में है इनकी धाक

हर सफल व्यक्ति के पीछे एक औरत का हाथ होता है, पढ़ें सफलता की ऐसी ही कहानी।

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ग्वालियर. इं सान में यदि काबिलियत है तो वह कुछ भी कर सकता है। उसके लिए हर वह काम संभव है जो जटिल माना जाता है। जिंदगी में सिर्फ खुशियों को ही ढूंढना चाहिए, फिर चाहे वह किसी भी रूप में क्यों न मिलें। मैंने भी अपने जीवन का सार इसी तरह से ढूंढा है। कुछ इसी अंदाज में अपनी बात रखी, मैकेनिकल इंजीनियर मोनिका निगम ने। उन्होंने पत्रिका के साथ अपने अनुभव बताते हुए कहा कि मैंने चार साल तक इसरो में साइंटिस्ट के रूप में काम किया। मैं लखनऊ की रहने वाली हूं और वहीं स्कूली पढ़ाई के साथ शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज से इंजीनियरिंग की। कॉलेज की पढ़ाई के अंतिम वर्ष के दौरान ही इसरो का एग्जाम दिया और सीधे साइंटिस्ट के रूप में प्रवेश पाया। यहां चंद्रयान मिशन, मास मिशन पर काम किया और मिसाइलमेन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा से मिलने का मौका मिला। उस समय इसरो में 750 पुरुष साइंटिस्ट के बीच केवल एक महिला साइंटिस्ट के रूप में उत्तर भारत से मैं ही थी। यहां चार साल काम करने के बाद शादी का प्रस्ताव आया और मैं ग्वालियर आ गई। यहां आकर परिवार की गैस इंडस्ट्री में काम शुरू किया। 10 वर्ष से टेक्निकल डायरेक्टर के रूप में काम कर रही हूं।

परिवार का पूरा सहयोग

मेरे काम में परिवार पूरी मदद करता है। मेरे फादर इन लॉ अशोक कुमार निगम और पति मनु निगम हमेशा मेरे साथ खड़े होते हैं। दिनभर काम के साथ सात साल की बेटी मानविका और ढाई साल के बेटे मोहक की पढ़ाई पर भी विशेष ध्यान देती हूं। मोनिका ने कहा, कुकिंग मेरा पैशन है। यही कारण है कि मास्टर शेफ सीजन-4 के चार राउंड करके टॉप 30 मेें शामिल हुई थी।

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गरीब महिलाओं को दे रहीं काम
मोनिका ने बताया कि कोविड के समय मैंने मेरी मित्र पूजा सिंह कुशवाह के साथ गरीबों को भोजन वितरण का काम किया था। बाद में उनके साथ एक एनजीओ खोला और इसके जरिए गरीब महिलाओं को कपड़े के थैले बनवाने का काम कर रही हूं। इससे उनकी आर्थिक मदद हो जाती है और मुझे खुशी मिलती है। इन महिलाओं के बनाए थैले सिंगापुर तक जा रहे हैं।

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