
जज्बे और जुनून से सिंगल किडनी के साथ ओलम्पिक मेडल जीता, अब लक्ष्य देश को कुछ वापस करूं
ग्वालियर.
कई विभूतियों को दी मानद उपाधियां, 1220 स्टूडेंट्स को प्रदान किया दीक्षांत, 30 को गोल्ड मेडल, 5 को पीएचडी की उपाधि
प्राकृतिक शक्तियों के संगीतमय आह्वान, शिक्षा के उत्सव का तुरई व शंख से आगाज और विचार यज्ञों के समागम के साथ आइटीएम यूनिवर्सिटी के सातवें दीक्षांत समारोह का आयोजन हुआ। इस सांस्कृतिक, गरिमामयी कार्यक्रम में देश का भविष्य निर्माण करने वाले युवाओं को शुभाशीष देने के लिए मंच पर कई राजनीतिक, कला, शिक्षा, विज्ञान व सामाजिक क्षेत्र की हस्तियां मौजूद रहीं। दीक्षांत समारोह दो सत्रों में बांटा गया, पहले सत्र में प्री-कन्वोकेशन सेरेमनी रखी गई, जिसमें विभिन्न हस्तियां स्टूडेंट्स से रूबरू हुईं। उन्होंने अपने जीवन व कार्य के अनुभव बांटते हुए उन्हें प्रेरित किया। दूसरा सत्र कन्वोकेशन सेरेमनी यानी दीक्षांत समारोह में मानद उपाधियां व ड्रिगीयां प्रदान की गई। कन्वोकेशन में मुख्य रूप से मप्र प्राइवेट यूनिवर्सिटी रेगुलेटरी कमीशन के चेयरमैन प्रो भरत शरण सिंह उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत एकेडमिक प्रोसेशन से हुई शंख और तुरही की ध्वनि के बीच अतिथियों का मंच पर आगमन हुआ आइटीएम में पढ़ रहे विभिन्न देशों के स्टूडेंट भी अपने अपने राष्ट्र का झंडा थामें सेरेमनी का हिस्सा बनें। तत्पश्चात कुलसचिव डॉ ओमवीर सिंह ने चांसलर रूचि सिंह चौहान से दीक्षांत समारोह के प्रारंभ करने की घोषणा के लिए अनुरोध किया। संस्थान की गतिविधियों और उपलब्धियों का वार्षिक प्रतिवेदन वाइस चांसलर डॉ एसएस भाकर ने प्रस्तुत किया।
कन्वोकेशन एड्रेस आइटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के फाउंडर चांसलर रमाशंकर सिंह ने दिया। उसके बाद चांसलर रूचि सिंह चौहान व अन्य अतिथियों के संबोधन के बाद मानद उपाधियों और स्टूडेंट्स को पदक का वितरण किया गया। प्री कन्वोकेशन में स्वागत उद्बोधन प्रो चांसलर डॉ दौलत सिंह ने व आभार प्रदर्शन प्रो वाइस चांसलर डॉ एसके नारायण खेडकऱ ने किया। इस मौके पर विशेष रूप से आरजीपीवी के वाइस चांसलर प्रो सुनील कुमार उपस्थित रहे।
मातृभाषा में लिखना सहज चुनाव
कुछ सवाल ऐसे हैं जिन्हें हमें पूछना चाहिए, संवाद की गुंजाइश बनती है। जैसे हमारे समाज में लेखक की हैसियत क्या है। इस पर विचार करना चाहिए कि आम जनता में लेखक के लिए हेय दृष्टि क्यों है। जबकि साहित्य दुनिया की व सबकी कहानी कहता है। मनन, चिंतन, आशा, विचार सब साहित्य में है। साहित्य प्यार से जन्मता है, प्रकृति से जोड़ता है, विचार, भावना, स्वच्छदंता की जगह है। मातृभाषा में लिखना सहज चुनाव है। उसमें अपने आप अभिव्यक्ति हो सकती है। ये भी सोचने वाली बात है कि यहां पूछा जाता है कि मातृभाषा में क्यों लिख रहे हैं विदेशी भाषा में क्यों नहीं लिख रहे। मातृभाषा की महत्वता पर विचार करना पड़ेगा। लेखक या कलाकार की उपयोगिता हम कैसे देखते हैं। ये भी प्रमुख सवाल हैं। आज की दुनिया सिर्फ फौरी नतीजे देख पाती है। अगर ये मापदंड या तराजू लेकर चल रहे है तो पता नहीं चलेगा लेखक आपको क्या देते हैं। आप उनके दिए अदृश्य को तौल नहीं सकते। साहित्य या कला आपके भीतर को परिष्कृत करते हैं आपके भीतर को जगह देते हैं।
गीतांजलि श्री, लेखिका
कलाएं आपके जीवन को समृद्ध करती हैं
कला का स्थान अगर जीवन में बढ़े तो बेहतर हैं। कई विद्याएं जो समाप्त न भी हो तो कम होने की संभावना है। आप चित्र बनाएं, संगीत, नाट्य में दिलचस्पी है तो बढ़ाइए। कलाएं आपके जीवन को समृद्ध करती हैं। हमारे अंदर बसा सृजनात्मक बीज को बढऩे की संभावना पैदा करती हैं। अंग्रेजी अब विदेशी भाषा नहीं रही देश के कई प्रतिनिधि लेखकों ने अंग्रेजी में लिखा है। अगर कोई पूर्वाग्रह दिलाता है कि इस भाषा में लिखो या इसमें नही ंतो उसे दूर कर देना चाहिए। युवाओं को सोशल टैबू से बाहर आना चाहिए। अपने विचारों के घोड़ो पर भागें। सोशल, माडर्न, प्राइवेट चाहे जैसी कला बनानी हो बनाएं।
पद्मभूषण गुलाम मोहम्मद शेख, प्रख्यात चित्रकार
पांच साल की उम्र से शुरू किया खेलना
मैंने अपना कॅरियर पांच साल की उम्र में शुरू किया मेरे पैरेंट्स का सपना था मुझे चैम्पियन बनाना। एथलेटिक टे्रनिंग आसान नहीं होती। जब मैं चौथी कक्षा में थी तब सुबह 4.30 से मेरा शेड्यूल शुरू होता था। ग्राउंड से स्कूल, स्कूल से ग्राउंड। बाद में मुझे महसूस हुआ यही मेरा सही रास्ता है। जब मैंनेे पेशनल चैम्पियनशिप जीती तो मेरा उत्साह बढता गया। मेरे जिंदगी में गुरू, पैरेंट्स, पति और परिवार ने सपोर्ट किया। ज्यादातर युवतियों का शादी के बाद कॅरियर खत्म हो जाता है। मैने अपना इंटरनेशन कॅरियर शादी के बाद शुरू किया। मैं सिंगल किडनी के साथ पैदा हुई। कोई एथलीट या खिलाड़ी सिंगल किडनी के साथ ओलिम्पक मेडल नहीं जीता लेकिन मैंने ये कर दिखाया। मेरा मानना है कि आप अपने पर विश्वास रखते हैं तो अपने सपने पूरे कर सकते हैं। रिटायरमेंट के बाद मेरा कर्तव्य है जो भी कुछ मुझे देश या समाज ने दिया, वो वापस करूं।
पद्मश्री अंजू बॉबी जॉर्ज, एथलीट
संगीत या कला किसी चीज को समझने का जरिया
90 साल की उम्र में यहां खड़े रहकर बात करना अच्छा लग रहा है। कई कलाओं मे संगीत ने सबसे उच्च स्थान प्राप्त किया हुआ है। संगीत अब लोगों के जिंदगी का हिस्सा है। प्रार्थना से लेकर मनोरंजन का माध्यम है। संगीत या कला किसी चीज को समझने का भी जरिया है। संगीत की खुद की भाषा और आवाज है। हमें संगीत को समझने या एंज्वॉय करने के लिए किसी प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं। इंडियन म्यूजिक में तो कई रिसर्च की जा रही हैं। म्यूजिक एजुकेशन अगर जॉब ओरियंटेड हो जाए तो कई लोग जुड़ेंगे। गवर्नमेंट, एजुकेशन पॉलिसी मेकर, संस्थाओ को एक साथ मिलकर नेशनल पॉलिसी बनानी चाहिए। उन्हें सोचना चाहिए कि संगीत को कैसे बढ़ाएं और लोगों को कैसे इससे ज्यादा से ज्यादा जोड़े।
पद्मविभूषण डॉ प्रभा अत्रे, प्रख्यात गायिका
मैं नियति में बहुत विश्वास करता हूं
एक आर्टिस्ट को हर वक्त लगता है कि जो सफलता मिल रही है वो उसके लायक नहीं है। क्योंकि हमेशा उसे एक तलाश खोज रहती है अगर वो खत्म हो जाती है तो कलाकार ही खत्म हो जाता है। राइट टू एजूकेशन सबसे बड़ा वरदान है जो हमें प्रिवलेज में मिला है। कई लोग हैं जो नहीं पढ़ पाए और अपने सपने पूरे नहीं कर पाए। मैं नियति में बहुत विश्वास करता हूं। जिंदगी में कुछ खराब होता है तो कुछ बहुत अच्छा आने वाला है। मेरे साथ अच्छा हुआ और मैंने हर बार चुनौती ली, आगे बढ़ा। मैं भी क्रिकेटर से म्यूजिक कम्पोजर, म्यूजिक कम्पोजर से डायरेक्टर बना और अभी भी सिलसिला जारी है। इस बीच बहुत हताश भी हुआ लेकिन हिम्मत करके अपने में विश्वास करके मैं आगे बढ़ा। बिना मेहनत व बिना ईमानदारी से कुछ नहीं मिल सकता। अपनी प्रतिभा को पहचानें।
विशाल भारद्वाज, डायरेक्टर, म्यूजिक कम्पोजर
यहां आपने जो सुना उसे अपनाएं
आज अपने यहां मौजूद विद्वानों से जो भी सुना, सीखा वो विषय आपके पाठ्यक्रम के बाहर के नहीं है, वे मल्टीडिसीप्लीनरी जैसे हैं। एडवांस कोर्सों की तरह यहां आपको जानकारी दी गई। युवा जिन गुणों के आधार परसफलताप्राप्तकरते हैं वे पांच निश्चित रूप से होने वाले लक्षण गुड मैनर, स्टुडियस, ऑप्टिमिस्टिक, डिटरमाइंड, स्ट्रांग होने ही चाहिए। हर क्षेत्र के सफल व्यक्तित्व जिनसे आप मिले इन्हीं गुणों से वे यहां तक पहुंचे हैं।
भरत शरण सिंह, चेयरमैन मप्र प्राइवेट यूनिवर्सिटी रेगुलेटरी कमीशन
मुश्किल और मेहनत से लंबी कूद लगती है
जीवन में सब लंबी कूद लगाना चाहते हैं ताकि जिस मंजिल पर पहुंचना चाहते है, पहुंच जाएं लेकिन याद रखें कि मुश्किल और मेहनत से लंबी कंूद लगती है। जब आपको आपकी कमियां पता होती हैं तो आप ज्यादा आगे जा सकते हैं। दुनिया में भाषाएं बहुत है लेकिन उनसे संगीत, कला या खेल की भाषा वे भाषाएं हैं जो हमें जोड़ती हैं। वहीं झंडे के गर्व, गौरव को बनाए रखने के लिए हमें मेहनत करनी है। तीन रंग समाहित होकर सफेद रंग बने रहें इस पर काम करने की हम सभी को जरूरत है। विश्विद्यालयों का कर्तव्य है सही लोगों को सही समय पर रास्ता दिखाएं और उनके जीवन को गुलजार करें।
सुनील कुमार, वाइस चांसलर आरजीपीवी
देश के लोग अगर गलत के खिलाफ लडऩे लगें तो युद्ध नहीं होंगे शांति और विकास दिखेगा
भारतीय संस्कृति व परम्पराओं में हम अतीत को महत्व देते हैं। अतीत में आख्यान व कथाएं भी आती हैं। लिखित परम्परा का कथा सागर आता है। स्त्री की मर्यादा, रक्षा और आजादी के लिए कई देवताओं और युगपुरूषों ने लोहा लिया। ईसा मसीह 30 साल की उम्र में सलीब पर लटके, तथागत बुद्ध को 30 साल की उम्र में ज्ञान और विवेक मिल गया। कई उदाहरण है कि छोटी उम्र में बड़े कार्य किए हैं। वैचारिक लड़ाई के साथ कम उम्र के कई कम उम्र के महान क्रांतिकारियों ने राष्ट्र के लिए लड़ाईयां भी लड़ी गईं। गांधीजी ने बड़ा काम किया लोगों को आंदालित किया। लगातार संघर्ष करने वाला आदमी संघर्ष से सत्ता में आने वाले से बड़ा है। आप भूले नहीं इन परम्पराओं को याद रखें और याद रखें आजादी। सारे देश के लोग अगर गलत के खिलाफ लडऩे लगें तो युद्ध नहीं होंगे शांति और विकास दिखेगा।
रमाशंकर सिंह, फाउंडर चांसलर, आईटीएम यूनिवर्सिटी
ये मेरे लिए एक भावुक दिन
ये मेरे लिए एक भावुक दिन होता है। मैं अपने स्टूडेंट्स को आगामी सफलताओं के लिए प्रेरित करने के लिए कहना चाहूंगी कि आप कुछ भी हासिल कर सकते हैं चाहे आप किसी भी उम्र, धर्म, जेंडर, रंग, क्षेत्र के हों सफल होने के लिए सिर्फ जज्बा, विचार और कड़ी मेहनत से कुछ भी हासिल कर सकते हैं। आज हम जनसंख्या में 8 बिलियन हो चुके हैं लेकिन पहले भी कुछ ही सफल होते थे और अब भी कुछ ही सफल होंगे, नाम कमाएंगे जिनमें स्किल्स, नॉलेज और विजन रहता है। युवाओं में कम्पेशन, कोलाब्रेशन, रिस्पेक्टि डिफरेंसेस, क्रिटिकल थिंकिंग,, एम्पथी आदि क्वालिटी होना चाहिए।
रूचि सिंह चौहान, चांसलर आईटीएम यूनिवर्सिटी
समता का विचार विलुप्त हो रहा है
सभ्य होने के साथ-साथ हम बंटते चले गए कभी देश, कभी धर्म, रंग या जेंडर में। शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य यह भी होता है कि हम सब अपनी मान्यताओं, विविधताओं, परम्पराओं के साथ भी न बंटे। आज देशों में युद्ध हो रहे हैं, महिलाओं के साथ भेदभाव हो रहा है, धर्मों के नाम पर झगड़े हो रहे हैं। समता का विचार विलुप्त हो रहा है। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य यह भी है कि लोगों में परस्पर, सम्मान, करूणा का भाव हो।
दौलत सिंह चौहान, प्रो चांसलर आइटीएम यूनिवर्सिटी
डॉ प्रभा आत्रे, विशाल भारद्वाज, अंजू बॉबी जॉर्ज सहित कई को मानद उपाधि
आइटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के दीक्षांत समारोह में देश की चुनिंदा हस्तियों को मानद उपाधियां (ऑनरिस कोजा) भी प्रदान किया, जिन्होंने अपने क्षेत्र में नए व विशिष्ट कीर्तिमान स्थापित किए है। इन हस्तियों में किराना घराना की गायिका पद्मविभूषण डॉ प्रभा अत्रे, प्रख्यात चित्रकार पद्मभूषण गुलाम मोहम्मद शेख, एथलीट पद्मश्री अंजू बॉबी जॉर्ज, इंटरनेशनल बुकर प्राइज विनर, लेखिका गीतांजलि श्री, फिल्म डायरेक्टर, स्क्रीनराइटर, प्रॉड्यूसर, म्यूजिक कम्पोजर, गायक विशाल भारद्वाज के नाम शामिल रहे। इन्हें डीलिट/डीएससी/पीएचडी उपाधियों से अलंकृत किया गया। सभी के जीवन व उपलब्धियों को शार्ट वीडियों में भी दर्शाया गया।
1220 को मिली डिग्री व मेडल
समारोह में इंजीनियरिंग, कम्प्यूटर एप्लीकेशन, बिजनेस एंड मैनेजमेंट विज्ञान, आर्ट एंड डिजाइन आदि के 1220 स्टूडेंट्स को गोल्ड मेडल, स्नातक व परातकोत्तर की उपाधियां प्रदान की गईं। विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर व उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले 30 स्टूडेंट्स को मेरिट के अंतर्गत गोल्ड मेडल व पांच को पीएचडी की उपाधि दी गई। इसके अलावा 11 स्पांसर्ड मेडल दिए गए।
Published on:
20 Nov 2022 12:03 pm
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