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यमराज का मंदिर-यहां रूप चौदस पर होती है पूजा ताकि अंतिम दिनों में नहीं हो कोई तकलीफ

फूलबाग में स्थित है 300 साल पुराना मंदिर

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यमराज का मंदिर-यहां रूप चौदस पर होती है पूजा ताकि अंतिम दिनों में नहीं हो कोई तकलीफ

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ग्वालियर. मध्यप्रदेश के ग्वालियर में यमराज का एक प्राचीन मंदिर है, जहां पर साल में तीन बार यमराज की विशेष पूजा होती है। कहते हैं यमराज की पूजा करने से जीवन के अंतिम दिनों में लोगों को तकलीफों का सामना नहीं करना पड़ता है। यहां यमराज की पूजा अर्चना करने के साथ ही उन्हें प्रसन्न करने के लिए अभिषेक करने के साथ ही विशेष प्रसाद का भोग लगाया जाता है।


फूलबाग में स्थित है 300 साल पुराना मंदिर


मध्यप्रदेश में यमराज का सबसे प्राचीन मंदिर ग्वालियर में है। फूलबाग चौराहे पर मारकंडेश्वर के नाम से यह मंदिर लगभग 300 साल पुराना है। मंदिर की सेवा कर रहे छठी पीढ़ी के पुजारी मनोज भार्गव बताते हैं कि मंदिर का निर्माण मराठा परिवार के संता जी राव तेमक ने कराया था। यमराज की विशेष पूजा दिवाली के एक दिन पहले रूप चौदस, दीपावली के दो दिन बाद यम द्वितीया और मकर संक्रांति पर की जाती है। पूजा के लिए दूर-दराज से लोग यहां आते हैं।

दूध, दही, शकर और शहद का लगता है भोग


यमराज का सरसों के तेल से अभिषेक किया जाता है। दूध, दही, शकर और शहद से भोग लगाया जाता है। शाम को चार बाती का दीपक दान किया जाता है, जो भक्त अपनी क्षमता के अनुसार चांदी, मिट्टी और आटे का करते हैं। मान्यता है कि यमराज की पूजा करने से उम्र के अंतिम दौर में इंसान को कष्ट नहीं होता। यह मंदिर श्रद्धा और आस्था का केंद्र माना जाता है।


यमराज की पूजा की पौराणिक कथा
यमराज की नरक चौदस पर पूजा अर्चना करने को लेकर पौराणिक कथा है। यमराज ने भगवान शिव की तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने यमराज को वरदान दिया कि आज से तुम हमारे गण माने जाओगे। दीपावली से एक दिन पहले नरक चौदस पर तुम्हारी पूजा की जाएगी।